ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपनी उग्रताको क्यों बढ़ाता जाता । अपना ईशत्व तू क्यों नहीं स्मरता ।
विश्व संभालना यदि नहीं चाहता । मेरे लिये ही स्मर तू ॥ ४३ ॥
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥
तुम कौन हो प्रभो ! —
एक बार वेद-वेद्य । त्रिभुवनका तू आद्य ।
विनति है विश्व-वंद्य । सुन तू मेरी ॥ ४४ ॥
ऐसा कह वह वीर । चरणपे रख शिर ।
कहता है सर्वेश्वर । सुन तू विनय ॥ ४५ ॥
अपना करने समाधान । मांग विश्व-रूपका दर्शन ।
औ' एक कालमें त्रिभुवन । निगल उठा तू ॥ ४६ ॥
अजी ! कह तू तब है भी कौन । कहांसे पाये भीषण आनन ।
शस्त्र क्यों लिये इतने महान । चमकाये हैं जो ॥ ४७ ॥
तेरा रुद्र-क्रोध भडक कर । दिखाता गगनको ओछा कर ।
दिखाता है आंखें निकालकर । भयग्रस्त होता विश्व ॥ ४८ ॥
कृतांतसे क्यों इतनी होड़ । कर रहा क्यों तू ऐसा अड़ ।
कह तू मुझसे यह गूढ़ । बात जो देव ॥ ४९ ॥
सुन यह कहता अनंत । कौन तू यह पूछता पार्थ ।
औ' होता क्यों ऐसा वृद्धिगत । उग्रतासे ॥ ४५० ॥
हो कौन बोलो विकराळ रूपी
तुझे नमस्कार देवेश बोलो ।
पहचान चाहूँ देवादिदेव
जानी न जाती करती तुम्हारी ॥ ३१ ॥
ज्ञानेश्वरी ३७६