ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्त मनोरथार्थ विश्व-रूप बना ऋषिकेश—
ऊपरका जो यह हाथ । चक्रचलानेमें है रत ।
वह चिन्ह स्पष्ट है तात । विश्व-मूर्तिका ॥ ९५ ॥
वहीं दूसरे हाथमें गदा । नीचेका हाथ है निरायुध ।
रास संभालते है गोविंद । सरसाते जो ॥ ९६ ॥
तथा उसी वेगसे तू सहसा । मेरे मनोरथार्थ ऋषीकेश ।
विश्व-रूप बना है विश्वेश । जानता हूं मैं ॥ ९७ ॥
किंतु है क्या यह अतिओज । मौका है न सोचनेका आज ।
हुवा है मेरा चित्त अबूझ । अतिशय तात ॥ ९८ ॥
यह विश्व-रूप है भी या नहीं । सोच ऐसा श्वास चलता नहीं ।
अंग-प्रभाकी जो यह नवाई । भरी है सर्वत्र ॥ ९९ ॥
इस तेजसे नयन झुलसता । सूर्य मलिन खद्योतसा भासता ।
ऐसी तीव्र है जिसकी अद्भुतता । यहां आज ॥ ३०० ॥
यह मानो महा-तेजका महार्णव । विश्वको डुबो देता है कर तांडव ।
युगांतका वज्रपात जैसे देख । ढक देता है ॥ १ ॥
अथवा संहार तेजकी जो ज्वाल । तोड़के मंडप बांधा अंतराल ।
दिव्य-चक्षुसे अब नभ-मंडल । देखा नहीं जाता ॥ २ ॥
अधिकाधिक प्रकाश उज्ज्वल । जलाता बनकर महाज्वाल ।
देखनेसे होती दृष्टि व्याकुल । दिव्यता होने पर भी ॥ ३ ॥
अथवा महा-प्रलयका प्रचंड । होता है जो कालाग्निरुद्रमें गूढ़ ।
उस तीसरे नयनके प्रगाढ़ । खुले हैं पलक ॥ ४ ॥
तथा फैला यह प्रकाश । पंचाग्नि-ज्वालाओंके पाश ।
करते ब्रह्मांडका शोष । अळकर ॥ ५ ॥
तेजाराशी है जो ऐसी अद्भुत । देखता मैं आज ही हो चकित ।
तेरी कांतिकी व्याप्ति है अनंत । विश्व-रूप ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६०