सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 437, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 437

महाकालसे हठ छोड़कर । अनेक मुख जो क्रोधसे भर ।
आकाशको ओछा मान विस्तार । दिखाते हैं अपना ॥ ५३ ॥
नभ-विस्तार न करता आकलन । त्रिलोक पवन न करता वेष्टन ।
जिसमेंसे ज्वाला निकलती महान । धधकती हुई ॥ ५४ ॥
इनमें हैं विविध आकार । वैसे ही हैं वर्णके प्रकार ।
प्रलयाग्नि भी लेता आधार । इन मुखोंका ॥ ५५ ॥
इतना है इनके अंगका तेज । इनसे राख होता विश्व सहज ।
एक मुखमें मुख उनमें तेज । दांत औ' दाढ भी ॥ ५६ ॥
हुवा यहां मानो वायुको धनुर्वात । समुद्र हुवा महापूरमें पतित ।
विषाग्नि मारनेमें हुवा प्रवृत्त । बड़वानलको ॥ ५७ ॥
पीता है जैसे अग्नि हालाहल । मृत्यु मरनेमें सन्नद्ध है नवल ।
संहार तेज आज निगलता खोल । मुख बन कर ॥ ५८ ॥
किंतु कैसे हैं ये विशाल । जैसे टूटा हुवा अंतराल ।
मानो आकाशका ही बिल । पड़ा है यह ॥ ५९ ॥
या वसुंधराको बगलमें दबाकर । हिरण्याक्ष घुसा जब पाताल गव्हर ।
पाताल कुहर खोला हाटकेश्वर । वक्त्र दीखते ऐसे ॥ ३६० ॥
तेरे मुखोंका ऐसा विकास । उसमें जिह्वाओंका आवेश ।
विश्व बनता अधूरा ग्रास । इसीलिये नहीं खाता ॥ ६१ ॥
तथा पातालव्यालोंका फूत्कार । विष ज्वाला जा छूती हैं अंबर ।
वैसी फैली है जिव्हा भयंकर । बदन-दरीमें ॥ ६२ ॥
प्रलय-विद्युतके झुंड लेकर । सजाये हैं जैसे गगन शिखर ।
मुखमें दीखते हैं दांत प्रखर । तथा दाढ भी वैसे ॥ ६३ ॥
जैसे ललाट परके अंचलमें । भयको ही डराते हैं अंधारमें ।
महा-मृत्युके हैं आवेग वेगमें । अंगार-सी आंखें ॥ ६४ ॥
ऐसा ले यह महा-भयका भोज । यहां क्या करने आया है तू काज ।
समझ न पा करके यह मुझ । मरण भय आया है ॥ ६५ ॥
३६७ विश्व रूप-दर्शनयोग