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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 445

सागरका जैसे आपोशन करना । तथा मेरु-पर्वतका कौर भरना ।
संपूर्ण ब्रह्मांड ही धरके चबाना । अपनी डाढोंसे ॥ ४३० ॥
सभी दिशाओंको निगल जाना । तारागण नभके चाट जाना ।
ऐसी सहज-लालसा धरना । यह है तेरा काम ॥ ३१ ॥
जैसे भोगसे है काम बढ़ता । ईंधनसे अग्नि धू धू करता ।
वैसे खा खा कर होठ चाटता । अधिक आशासे ॥ ३२ ॥
किया कैसा यह एक ही पसारा । जिह्वाग्रे रखा त्रिभुवन सारा ।
डाला है यह एक छोटासा कौर । वडवानलमें ॥ ३३ ॥
ऐसे हैं जो अगणित वदन । आर्थ कैसे इतने त्रिभुवन ।
इससे क्षुधा न होती सहन । बढती असह्य ॥ ३४ ॥
अजी ! है यह विश्व बेचारा । वदन-ज्वालामें पडा सारा ।
दावानलका पडा है घेरा । भेडों पर यहां ॥ ३५ ॥
विश्वका ऐसा हुआ अब । दैव कर्म नहीं आया तब ।
चराचर पर फैला सब । अकालका जाल ॥ ३६ ॥
विश्व-रूपका यह तेज-मंडल । बहुलियाका फैलाया हुआ जाल ।
मुख नहीं लाक्षाग्नि-ज्वाल । घेरता चराचरको ॥ ३७ ॥
जलाती कैसी अपनी दाहकता । इस बातको अग्नि नहीं जानता ।
किंतु जो जलता है वह जानता । नहीं बचते उसके प्राण ॥ ३८ ॥
अजी ! अपनी तीखी धारसे कैसे । न जानता शस्त्र-घात होता जैसे ।
अपना विनाश न जानता वैसे । हालाहल विष ॥ ३९ ॥
वैसे तुझको भी ज्ञात है नहीं । अपनी उग्रताकी बात सही ।
प्रत्येक मुखसे यहां हो रही । विनाश-लीला ॥ ४४० ॥
यदि तू है आत्मा एक । सकल विश्व-व्यापक ।
तब हमारा अंतक । हो आया कैसे ॥ ४१ ॥
छोडी मैंने जीवितकी आस । तू भी छोड दे संकोच खास ।
कह अपनी भानकी क्या खास । बात है आज ॥ ४२ ॥
३७५ विश्व-रूप-दर्शनयोग