ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेरे शरीरका यह जो तेज । जलाता है सारे कर्मका बीज ।
जिससे तुझमें मिलते निज । सद्भावनासे ॥ २७ ॥
तथा जो हैं सहज भय-भीत । होकर तेरे पथके अमित ।
गाते हैं तेरी प्रार्थनाके गीत । कर जोड करके ॥ २८ ॥
देव ! डूबे हैं अविद्या-सिंधुमें । फंसे हैं विषय-विष-जालमें ।
फंसे हैं स्वर्ग-संसार फंडोंमें । दोनों ओरसे ॥ २९ ॥
ऐसे हमको करनेमें मुक्त । कौन हैं त्रिभुवनमें समस्त ।
आये हैं हम सो शरणागत । कहते हैं ये ॥ ३० ॥
तथा महर्षि अथवा सिद्ध । विद्याधर संघ जो विविध ।
गाते हैं तेरा ही स्वस्तिवाद । तथा शुभ-स्तवन ॥ ३१ ॥
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गंधर्वयक्षासुरसिद्धसंघा
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥
रुद्र-आदित्योंके ये समुदाय । वसु साध्य आदि ये देव ।
अश्विनी विश्वे-देव स-वैभव । मरुत भी वहां ॥ ३२ ॥
सुनो अग्नि तथा गंधर्व । यक्ष राक्षस गण सर्व ।
महेंद्रादि जो मुख्य देव । तथा सिद्धादिक ॥ ३३ ॥
ये सब धर अपना स्वस्थान । विस्मित करते अवलोकन ।
महा-मूर्तिका है दिव्य-दर्शन । देखता हूँ मैं ॥ ३४ ॥
आदित्य विश्वे वसु रुद्र साध्य
कुमार दोनों पितृ-देव वायु ।
गंधर्व दैत्यों सह यक्ष सिद्ध
सारे तुझे विस्मित देखते हैं ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी
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