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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 443

दांतोंमें फंसे हैं कुछ रत्न । कुछ चूर्ण हो गये हो भग्न ।
जिव्हा-मूलमें फंसा चूरन । कुछ दांतोंमें ॥ १६ ॥
विश्व-रूप है यह महाकाल । चबाता लोगोंकी देह सबल ।
किंतु जीव देहका शिर-कमल । रखता आवश्य ॥ १७ ॥
वैसे शरीरमें है चोख । उत्तमांग जो शिर सम्मुख ।
महाकालके मुखमें देख । शेष रहे हैं ॥ १८ ॥
कहता है फिर अपनेसे अर्जुन । अन्य गति नहीं जो कुछ हुवा है जनन ।
करते हैं वे इस मुखमें गमन । अपने आप ॥ १९ ॥
यहा हुवा है जो सृष्ट । होता है इस मुखमें प्रविष्ट ।
निगलकर सब होता पुष्ट । विश्व-रूप काल ॥ ४२० ॥
समस्त हैं जो ब्रह्मादिक । स-वेश जाते ऊंचे मुख तक ।
पड़ते हैं जाके सामान्य लोक । इसी ओरके मुखमें ॥ २१ ॥
अन्य सभी हैं जो भूत-जात । जन्मते वही होते ग्रसित ।
किंतु इनका मुख निर्भ्रांत । न छूटता कोई ॥ २२ ॥
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवंति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा
'विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वल॑ति ॥ २८ ॥
जैसे हैं महानदीके ओघ । डूबते हैं सिंधुमें अथांग ।
वैसे सभी ओरसे हैं जग । जाता इस मुखमें ॥ २३ ॥
आयुष्य पथमें प्राणि-गण । करके अहो रात्र प्रयाण ।
इस मुखमें पाते निधान । अति-वेगसे ॥ २४ ॥
जैसे नदीके जलके प्रवाह
दौडे हुए सागरमें समाते ।
वैसे समाते नर वीर सारे
सवेग तेरे जलते मुखों में ॥ २८ ॥
३७३ विश्व-रूप-दर्शनयोग