ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहुवा अमरावति पर आक्रमण । किया है मैने अकेलेने निवारण ।
ऐसा मैं महाकालको भी कठिन । डरानेमें ॥ ८७ ॥
किंतु हे यह प्रसंग दुर्धर । मृत्युको भी तूने निगलकर ।
भर लिया है मेरा भी जो कौर । विश्व सह सकल ॥ ८८ ॥
ऐसा नहीं था अब प्रलय काल । बनकर आया है तू महाकाल ।
बेचारा बना त्रिभुवन सकल । अल्पायुषी आज ॥ ८९ ॥
विधि-विधान है यह विपरीत । उठा हुवा बिघ्न करनेमें शांत ।
मह-विघ्न उठ आया अकल्पित । विश्व-प्रलयका ॥ ३९० ॥
बात नहीं यह काल्पनिक । खेलकर तू अनंत-मुख ।
सैन्यका कौर लेता है देख । चहूं ओरसे तू ॥ ९१ ॥
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः
सर्वे सहैवावनिपालसंघैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६ ॥
ये सब कुरु-कुलके वीर । अंध धृतराष्ट्रके कुमार ।
गये रे गये स-परिवार । तेरे कराल मुखमें ॥ ९२ ॥
तथा आये हैं यहां जो देश देशके । इनके सहायक हो दौड़ दौड़के ।
न रहेंगे ये तेरे कौर बनके । नाम कहनेको भी ॥ ९३ ॥
मद-मस्त हाथियोंके जो झुंड । निगलता तू पकड पकड़ ।
तथा योद्धाओंको भी धड़ाधड । निगलता जाता ॥ ९४ ॥
शातघ्निके संहारक । पदचारी जो कटक ।
भरता है तेरा मुख । पता न चलता ॥ ९५ ॥
अहा ! सभी ये धृतराष्ट्र पुत्र
लेके सभी राज समूह साथ ।
ये भीष्म ये द्रोण ये सूत पुत्र
औ' वीर सारे अपने अनेक ॥ २६ ॥
ज्ञानेश्वरी ३७०