ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसबका नाश करनेवाली दैवी शक्ति—
फूटा महा-मृत्युका मशक । ऐसे जो तेरे मुख अनेक ।
नाचते हैं आंखोंके सम्मुख । फैले हुए ॥ ७५ ॥
दांत औ' डाढोंकी खुली कतार । ओंठ न छिपा सकते प्रखर ।
प्रलय-शस्त्रोंका पडा है घेर । लगा है जैसे ॥ ७६ ॥
तक्षमें भरा हालाहल जहर । काल-रात्रिमें हुवा भूत-संचार ।
या आया वज्राग्नि-अग्न्यस्त्र धर । वैसा यह रूप ॥ ७७ ॥
वैसे ही तेरा वदन बिकराल । उसमें मृत्यु-रसका रेलारेल ।
फिर आवेश उमडता विपुल । हम पर ही ॥ ७८ ॥
संहार-कालका चंडानिल । महाकल्पका प्रलयानल ।
हुवा दोनोंका संहार-मेल । फिर न जलेगा क्या ॥ ७९ ॥
वैसे तेरे ये संहारमुख । देखा हुवा मेरा धैर्य खाख ।
भूला मैं अब दिशा भी देख । तथा अपनेको भी ॥ ३८० ॥
विश्व-रूप देखा क्षण काल । तथा पडा सुखका अकाल ।
समेट ले तू रूप विशाल । जो है अस्त-व्यस्त ॥ ८१ ॥
ऐसा करेगा तू यह यदि जानता । विश्व-रूपकी मैं बात भी क्यों करता ।
रक्षा कर तू प्राणकी परम-पिता । इस स्वरूप प्रलयसे ॥ ८२ ॥
भगवानका हेतु अर्जुनका मोह —-
यदि तू स्वामी है हमारा अनंत । रक्षण कर डाल बन जीवित ।
समेटले फैलाव अपरमित । महा-मृत्युका ॥ ८३ ॥
सुन तू सकल देवोंका परम देव । चैतन्य तू तुझमें बसता विश्व सर्व ।
भूला तू सबको जीवन देना सदैव । और लगा संहारमें ॥ ८४ ॥
प्रसन्न हो त्वरित देवराय । समेट ले अपना महाकाय ।
उद्धार कर मेरा भय-मय । मृत्यु वशासे ॥ ८५ ॥
करता हूं पुनः पुनः ऐसा विनय । हुआ है इतना भय-ग्रस्त हृदय ।
विश्व रूप देख कर खाया भय । मैने जनार्दन ॥ ८६ ॥
३६९ विश्व-रूप-दर्शनयोग
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