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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 438

देव ! विश्व रूप देखनेकी आस । उसका प्रतिफल है यह खास ।
उसको देखा है मैंने स-हव्यास । हुईं अब आंखें शांत ॥ ६६ ॥
शरीर है यह नाशवंत पार्थिव । उसका नहीं है यहां विशेष भाव ।
अविनाशी चैतन्यका न रहा ठाव । जीने मरनेका ॥ ६७ ॥
भयमें है वैसे अंग कांपता । बढता है तब मन तापता ।
अथवा बुद्धिका बल हिलता । गलता अभिमान ॥ ६८ ॥
इन सबसे जो है निराला । केवल जो आनंदैककळ ।
वह अंतरात्मा भी निश्चळ । कांपता यहां ॥ ६९ ॥
लगा साक्षात्कारका वेध । नष्ट किया है सब बोध ।
ऐसा गुरु-शिष्य संबंध । मिलेगा कहां ॥ ३७० ॥
देवेश ! तेरा जो यह दर्शन । शिथिल करता अंतःकरण ।
उसको संभालनेमें जतन । करता हूं मैं ॥ ७१ ॥
धैर्य जो मेरा संपूर्ण खो गया । तूने यह विश्व-रूप दिखाया ।
तथा मुझको है उलझा दिया । उपदेशमें ॥ ७२ ॥
यहां आसरा पानेमें जीव । करता है चारों ओर धांव ।
उसको नहीं मिलता ठाव । इस रूपमें ॥ ७३ ॥
विश्व-रूप ऐसा महामार । निर्जीव करता है चराचर ।
तब रहे कैसे मौन होकर । देव देवेश ॥ ७४ ॥
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्ट्रैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५ ॥
कल्पांत अग्नीसम दीखतें है
प्रचंड मुख औ' कराल दाढ ।
दिशा न सूझे मुख-शांति नाशे
प्रसन्न हो तू जगके निवास ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६८