ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
प्रथम है जान तू बुद्धि । फिर ज्ञान जो निरवधि ।
असंमोह सहन सिद्धि । क्षमा सत्य ॥ ८३ ॥
तब इंद्रिय मन दमन । सुख दुखमें समवर्तन ।
भाव अभाव मान अर्जुन । मेरे ही विकार ॥ ८४ ॥
भय तथा अभयता । अहिंसा तथा समता ।
मेरा रूप पांडुसुत । जान तू यह ॥ ८५ ॥
दान यश अपकीर्ति । इन भावोंकी वसती ।
मेरी ओरसे है होती । सब भूतोंमें ॥ ८६ ॥
जैसे भूत जात भिन्न भिन्न । वैसे मेरे गुण भी है जान ।
होते मेरे ज्ञानसे उत्पन्न । कुछ अज्ञानसे भी ॥ ८७ ॥
जैसे प्रकाश औ' अंधार । लेकर सूर्यका ही आधार ।
फैलता अस्तमें है अंधार । उदयमें वैसे प्रकाश ॥ ८८ ॥
मेरा ज्ञान और अज्ञान । है जो दैवके ही कारण ।
तभी भूतोंमें भाव जान । कम और अधिक ॥ ८९ ॥
तभी जीव सृष्टि संपूर्ण । मेरे ही विकारमें तू जान ।
उलझी हुई यहां अर्जुन । जान तू यह ॥ ९० ॥
अब इस सृष्टिके पालक । जिसके आधीन होते लोक ।
वे ग्यारह भाव भिन्न देख । कहता तुझे ॥ ९१ ॥
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥
संपूर्ण गुणसे जो वृद्ध । औ' महर्षियोंमें प्रबुद्ध ।
जो हैं कश्यपादि प्रसिद्ध । सप्त-ऋषी ॥ ९२ ॥
चौदह मनु जो विख्यात । उसमें चार प्रतिष्ठित ।
स्वयंभू आदि ख्याति प्राप्त । कहे हैं अन्य ॥ ९३ ॥
महर्षि सात आदीके मनु जो चार हैं तथा ।
मेरे संकल्पसे भाव लोकमें उनकी प्रजा ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ३०६
ऐसे एकादश ये समस्त । मेरे मनसे ही है निर्मित ।
सृष्टि व्यापार संचलनार्थ । धनुर्धर ॥ ९४ ॥
न हुए थे लोक व्यवस्थित । ये त्रिभुवन अनधिष्ठित ।
तथा यह सब भूतजात । जो था पडा हुआ ॥ ९५ ॥
तभी हुए ये ग्यारह उत्पन्न । उन्होने ही लोकपाल निर्माण ।
करके उनको अध्यक्ष जान । रखा यहां ॥ ९६ ॥
इसलिये ये ग्यारह राजा । उनके रहे अनेक प्रजा ।
है विस्तार यह सजा-धजा । मेरा ही सारा ॥ ९७ ॥
पहले होता है बीज एक । वही बनता तना नेक ।
उसमें ही अंकुर अनेक । निकलते हैं ॥ ९८ ॥
उस अंकुरके अनेक । निकलते शाखोपशाख ।
शाखाओंमें फुटते देख । असंख्य पल्लव ॥ ९९ ॥
उन पल्लवोंमें फल फूल । वृक्षत्व बहरता सकल ।
चिंतन रतको है केवल । बीज-मात्र ॥ १०० ॥
वैसे मैं आदि एक ही जान । उत्पन्न है मुझसे ही मन ।
मनसे सप्तऋषी उत्पन्न । तथा मनु भी ॥ १ ॥
उन्होंने किये लोकपाल निर्माण । लोक-पालोंने किया लोकसृजन ।
लोकोंसे हुई नाना प्रजा उत्पन्न । दीखती जो ॥ २ ॥
ऐसे इस विश्वका निर्माण । किया मैने ही पूर्ण रूपेण ।
चिंतन रतको होता ज्ञान । अन्यको नहीं ॥ ३ ॥
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥ ७ ॥
मेरा जो योग-विस्तार जानता यह तत्वता ।
वह निश्चय पायेगा इस निष्कंप योगको ॥ ७ ॥
३०७ विभूति-चिंतनयोग
मैं सर्व व्यापी हूँ इसलिये “जो जो मिला भूत । उसे मान भगवंत”—
इसी लिये सुभद्रा-पति । ये भाव मेरी ही विभूति ।
तथा उसकी है ये व्याप्ति । संपूर्ण विश्व ॥ ४ ॥
इसीलिये सुन तू पार्थ । ब्रह्मादिसे चीटि पर्यंत ।
बिना मेरे दूसरी बात । नहीं है विश्वमें ॥ ५ ॥
ऐसे जो जानता यथार्थ । ज्ञान बोधसे हो जागृत ।
उसे नहीं दुःस्वप्न द्वैत । उत्तम-मध्यमादिक ॥ ६ ॥
मैं तथा मेरी विभूति । औ' विभूति व्याप्त व्यक्ति ।
एक है यह प्रतीति । करता वह ॥ ७ ॥
ऐसे जो संवेह रहित । अनुभव-ज्ञान सहित ।
मिलकर हुआ कृतार्थ । मनसे मुझमें ॥ ८ ॥
ऐसे जो मुझको भजता । अभेद दृष्टिसे जानता ।
भजन नादमें झूमता । उसके मैं ॥ ९ ॥
भक्तियोग यह भेद रहित । है अखंड तथा संशयातीत ।
आचारमें टूट भी शुभदाता । ऐसा कहा छठेमें ॥ ११० ॥
मेरा यह अभेद ज्ञान । जानना चाहता तो मन ।
कहता हूँ उसको सुन । ध्यान देकर ॥ ११ ॥
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥८॥
मुझसे ही यह संपूर्ण । होता है विश्वका जनन ।
तथा है पालन पोषण । मुझसे ही ॥ १२ ॥
जैसे जल-कल्लोल माल । उसका जन्मदाता जल ।
औ' आधार भी वही जल । तथा जीवन भी ॥ १३ ॥
मुझमें सबका मूल प्रेरणा मुझसे सब ।
यह जान मुझे ज्ञानी भजता भक्ति-भावसे ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ३०८
जैसे यहां सर्वत्र कहीं । जलके बिना कछु नहीं ।
वैसे विश्वमें जहां कहीं । मेरे बिन ना कछु ॥ १४ ॥
मुझे ऐसे व्यापक मान । भजन करते सर्व स्थान ।
ये उनके भजन पूजन । प्रकट है प्रेम-भावसे ॥ १५ ॥
देशकाल वर्तमान । मुझमें देख अभिन्न ।
जैसे वायु हो गगन । फिरता गगन में ॥ १६ ॥
ऐसे निज-ज्ञान संपन्न । हो विचरते त्रिभुवन ।
मुझको जगद्रूप मान । अंतः करणमें ॥ १७ ॥
जो जहां मिलता है भूत । उसीको माना भगवंत ।
यह भक्ति-योग निश्चित । मेरा जान ॥ १८ ॥
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ ९ ॥
दो भक्तोंकी भेंट आनंद-महोत्सव है—
अन्तःकरण मैं बना । प्राण भी मद्रूप बना ।
भूला है जीव मरण । बोध-मूलसे ॥ १९ ॥
फिर बोधके नशेमें । औ' संवादके सुखमें ।
नाचते लेने देनेमें । ज्ञानानंदके ॥ २० ॥
जैसे समीपके दो सरोवर । उमड आते जब परस्पर ।
बनाते तब तरंग ही घर । तरंगको वैसे ॥ २१ ॥
होता जब भक्तसे भक्तका मिलन । मानो आनंदसे आनंदका गुंफन ।
ज्ञानसे करता ज्ञानका ही भूषण । ज्ञानके लिये ॥ २२ ॥
सूर्यसे सूर्यकी आरती उतारना । चंद्रने चंद्रका आलिंगन करना ।
या-गंगा यमुनाका है मिलन होना । वैसे ही धनंजय ॥ २३ ॥
चित्त प्राण मुझे मान बोध देते परस्पर ।
मेरे कीर्तनमें नित्य रमते तुष्ट होकर ॥ ९ ॥
३०९ विभूति-चिंतनयोग
जैसे प्रयाग है समरसका । संगम प्रवाह सात्विकताका ।
हुआ जो सुसंवाद चौराहका । गणपति ही मानो ॥ २४ ॥
तब है महा सुखके नशेमें । उडे देह-ग्रामके बाहरमें ।
आत्म-तृप्तिके गर्जनानंदमें । गूंजता गगन ॥ २५ ॥
गुरु शिष्यका एकांत-स्थल । वहां भी देखके देश-काल ।
कहनेकी बात जो मंगल । गरजते हैं मेघ-से ॥ २६ ॥
पूरा खिला हुआ जो कमल । समा न सकता परिमळ ।
अभेद रूप देता प्रफुल्ल । आमोदोन्माद ॥ २७ ॥
सदा सर्वत्र मेरा गुणवर्णन । औ' वर्णनानंदमें खो जाता कथन ।
उस खोनेमें घुलते तन मन । जीव सहित ॥ २८ ॥
जीत लिया मत्सुख पूर्ण । प्रेमोत्कर्षमें हों बे-भान ।
भूले देश-काल भी पूर्ण । अपनेमें ही ॥ २९ ॥
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १० ॥
भक्त केवल मेरा प्रेम-सुख चाहते हैं—
हमको उन्हे जो कुछ देना था । उन्होने पहले ही पालिया था ।
हमारे दिये बिना कमाया था । फिर रहा क्या देनेको ॥ १३० ॥
उनका जो निश्चित पथ । उसके सम्मुख हे पार्थ ।
स्वर्ग-मोक्ष आदिके पथ । जैसी पगडंडियां ॥ ३१ ॥
अंगीकार किया उन्होंने प्रेम । दे देना है जो हमारा नियम ।
कर लिया उन्होंने वही काम । नाम लिया हमारा ॥ ३२ ॥
अनुदिन वह बढते जाये । कालकी दृष्टि नहीं पड पाये ।
इतना ही काम हमारे लिये । रहता है तब ॥ ३३ ॥
ऐसे मगन जो नित्य भजते प्रीति-पूर्वक ।
देता उन्हे बुद्धि योग जिससे मैं मिलूं उन्हे ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी ३१०
अध्याय ७: ज्ञानविज्ञानयोग
ममता दृष्टिका आच्छादन कर । जैसे दौडती है माता धनुर्धर
शिशुके पीछे सदा बद्ध होकर । रहता जो क्रीडारत ॥ ३४ ॥
शिशु जब जो जो खेल दिखाता । उसे स्वर्णमय करती माता ।
वैसे भक्तका प्रभुत्व बढाता । मैं उपासनामें ॥ ३५ ॥
उस उपासना पोषणसे । भक्त मिलन होगा मुझसे ।
देखता है इस भांतिसे । भाता है मुझे ॥ ३६ ॥
अजी ! भक्तकी मुझे है आस । उसकी एक-निष्ठाकी प्यास ।
प्रेमी भक्तोंका अकाल खास । रहता मेरे यहां ॥ ३७ ॥
स्वर्ग औ' मोक्षके पथ । छोड दिये उन्हींके हाथ ।
दिया तन लक्ष्मीके साथ । शेषके आधीन ॥ ३८ ॥
अपने पास केवल एक । रखा है निर्मल प्रेम-सुख ।
वह प्रेमियोंके लिये देख । किया जतन ॥ ३९ ॥
जैसे कहा मैंने अब तक । देखके अपनत्व नेक ।
लेते प्रेमियोंका प्रेम एक । जो शब्दसे परे ॥ ४० ॥
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ ११ ॥
मुझ आत्मामें ही प्रेम-भाव । जिन्होंने किया जीनेका ठाव ।
उसके बिना अन्य पांडव । सब है व्यर्थ ॥ ४१ ॥
ऐसे प्रिय तत्वज्ञोंके सम्मुख । कर्पूर मशाल हाथमें रख ।
चलता हूं मैं आगे आगे देख । राह दिखाते ॥ ४२ ॥
उनको अज्ञान रातमें । घिरे हुए घने तममें ।
दूर कर तम राहमें । करता नित्योदय ॥ ४३ ॥
अर्जुनको कृष्ण परब्रह्म होनेका भास ---
प्रिय भक्तोंका प्रियतम । बोला जब पुरुषोत्तम ।
कहा अर्जुनने सप्रेम । मन हुआ शांत ॥ ४४ ॥
करुणा करके मैं ही हियमें रहके नित ।
तेजस्वी ज्ञान ज्योतीसे अज्ञान तम नाशता ॥ ११ ॥
३११ विभूति-चिंतनयोग
अजी ! मुझे क्या सुना दिया । संसार तापसे दूर किया ।
जन्म-मरणसे है छुड़ाया । कृपाकर प्रभु ॥ ४५ ॥
यह नव-जन्म अपना । देखते अपने नयन ।
मेरे हाथ आया जीवन । मन भाया जो ॥ ४६ ॥
उज्ज्वल हुआ आज आयुष्य । हुआ दैव दशाका उदय ।
वाक्प्रसाद पाया हे सदय । दैव मुखसे ॥ ४७ ॥
तेरे वचनके प्रकाशसे । अंतर्बाह्य तम मिटनेसे ।
देखता हूं यथार्थ रूपसे । स्वरूप तेरा ॥ ४८ ॥
अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ १२ ॥
अजी ! वही है तू परब्रह्म । महाभूतोंका विश्राम-धाम ।
पवित्र तम अति परम । जगन्नाथ ॥ ४९ ॥
परम दैवत तू तीनोंका । पुरुष है तू पंचवीसका ।
दिव्य है तू प्रकृति भावका । परे है जो श्रेष्ठ ॥ १५० ॥
स्वामी तू है अनादि-सिद्ध । जन्म रहित जो प्रसिद्ध ।
हमने पाया अब शुद्ध । स्वरूप तेरा ॥ ५१ ॥
काल-यंत्रका तू सूत्रधार । जीवन कलाका कर्णधार ।
तू ही है ब्रह्मांडका आधार । जाना यह निश्चित ॥ ५२ ॥
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥ १३ ॥
यहां ओर ही एक भांति । आती है इसकी प्रतीति ।
ऋषियोंने भी इसी भांति । किया है वर्णन ॥ ५३ ॥
अर्जुनने कहा
पवित्र तू पर-ब्रह्म श्रेष्ठ जो मोक्ष-धाम तू ।
आत्मा शाश्वत औ' दिव्य अजन्मा आदि औ' विभु ॥ १२ ॥
गाते हैं ऋषि जो सारे तथा असित देवल ।
व्यास नारद देवर्षि वैसे ही आपने कहा ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी ३१२
उन ऋषियोंने जो कहा था । अनुभवमें आयी सत्यता ।
कृपया आपने सुनाया था । इसीलिये अब ॥ ५४ ॥
आता था देव-ऋषि नारद । गाता था ऐसे बचन छंद ।
गानेका ही लेकर आनंद । खो देते थे अर्थ ॥ ५५ ॥
प्रकट हुए यदि भास्कर । अंधोंके ही गांवमें आकर ।
बिना उष्णताके तापकर । देखें प्रकाश कैसे ॥ ५६ ॥
सुन देवर्षि नारदका अध्यात्म-गान । उससे केवल नाद-माधुर्य ही सुन ।
चितसे न कर उसका सार-ग्रहण । छोड देते थे ॥ ५७ ॥
असित देवलके मुखसे । सुना है तेरा चरित्र ऐसे ।
किंतु चित्त विषय-विषसे । था अति ग्रस्त ॥ ५८ ॥
विषय-विष होता भयंकर । तीता विषय है अति मधुर ।
तथा परमार्थ होता मधुर । लगता तीता ही ॥ ५९ ॥
अजी ! औरोंका क्या कहना । भवनमें तेरा गुण गाना ।
व्यास देवका नित सुनाना । तेरा चरित्र श्रेष्ठ ॥ १६० ॥
अंधारमें चिंतामणि देखा । उपेक्षासे नहीं उठा सका ।
उजालेमें पहचान सका । ऐसे ही है यह ॥ ६१ ॥
वैसे व्यासादिकोंके वचन । मेरी भी जो चिद्रत्नोंकी खान ।
उपेक्षित पड़ी थी श्रीकृष्ण । बिना प्रकाशके ॥ ६२ ॥
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हिते भगवन् व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥ १४ ॥
फैले तेरे वाक्सूर्य किरण । ऋषि-वाक्योंका हुआ स्मरण ।
मिटा सब अपरिचितपन । तेरी कृपासे ॥ ६३ ॥
ज्ञान-बीज रूप थे उनके बोल । हृदय-भूमिमें जमे थे सकल ।
उसपे तेरी कृपाका यह ओल । संवाद फल आया ॥ ६४ ॥
मानता सत्य ये सारा स्वयं तू कहता मुझे ।
देव दानव कोयी भी तेरा रूप न जानते ॥ १४ ॥
(40) ३१३ विभूति-चिंतनयोग
अजी ! नारदादिक जो संत । उनकी उक्ति रूप सरिता ।
मैं महोदधि बना अनंत । संवाद सुखका ॥ ६५ ॥
मेरा अनेकानेक जन्म- । किया हुआ जो सत्कर्म ।
फला है यह अत्युत्तम । तू सद्गुरु रूप ॥ ६६ ॥
वैसे सुने थे वृद्धोंके वचन । सदैव तेरे ही गुण-वर्णन ।
हुई अब तेरी कृपा महान । तभी फले सब ॥ ६७ ॥
तभी भाग्य होता अनुकूल । उद्यम होते सब सफल ।
सुना था वह है जो सफल । हुआ गुरु कृपासे ॥ ६८ ॥
माली जिसमें जन्म बिताता । गाछ लगाकर जन्म देता ।
किंतु वसंतमें ही खिलता । अनायास ॥ ६९ ॥
जब विषम ज्वर उतरता । तभी रसनामें स्वाद आता ।
रसायन भी है जो फल देता । जब होता आरोग्य ॥ १७० ॥
वाचा श्रवण नयन प्राण । अनुभवते सार्थकपन ।
संचरता उसमें चेतन । तभी मात्र ॥ ७१ ॥
वैसे शब्दजातका अध्ययन । योगाभ्यासादि समस्त साधन ।
अपना कह सकते हैं जान । जब गुरु अनुकूल ॥ ७२ ॥
इस प्रतीतिके आनंदसे । नाचता अर्जुन निश्चयसे ।
कहता है हे देव ! कृष्णसे । तेरी बात मानी ॥ ७३ ॥
सच है यह कैवल्यपति । हुई मुझे त्रिशुद्ध प्रतीति ।
सुरासुर-नरादिकी मति । न जानती तुझे ॥ ७४ ॥
न सुनकर तेरा वचन । अपनेसे ही कर चिंतन ।
अशक्य है होना तेरा ज्ञान । हुआ मेरा निश्चय ॥ ७५ ॥
स्वयमेवात्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ १५ ॥
तू ही है अपने आप जानता पुरुषोत्तम ।
देव देव जगन्नाथ भूतेश-भूत भावन ॥ १५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३१४
जीव स्व-सामर्थ्यसे ईश्वरको नहीं जान सकता—
जैसे अपनी विशालता गगन । आप ही जानता संपूर्ण रूपेण ।
अथवा जैसे अपना हो सपना । जानती पृथ्वी ॥ ७६ ॥
वैसे अपनी सर्वशक्ति । जानता तू ही लक्ष्मीपति ।
यहां वेदादिककी मति । अकडती व्यर्थ ॥ ७७ ॥
दौडनेमें जीतना मनको । आंकना हाथसे पवनको ।
पार करना आदि शून्यको । कैसे संभव ॥ ७८ ॥
ऐसा है तुझे जानना । उसको कह सकना ।
असंभव तेरे बिना । अन्य किसीको ॥ ७९ ॥
तू ही जानता अपनी बात । कहनेमें भी तू ही समर्थ ।
देव ! मेरे माथे का तू आर्त- । पसीना पोंछ दे ॥ १८० ॥
सुना क्या यह भूत-भावन । त्रिभुवन-गज-पंचानन ।
सकल देव-देवतार्चन । जगन्नायक ॥ ८१ ॥
जानना चाहें तो तेरा बड़प्पन । उसके सम्मुख हम रजकण ।
यह जान हुए तो सलज्ज मौन । नहीं अन्य उपाय ॥ ८२ ॥
चहूँ ओर सरिता सागर भरा । किंतु चातक बेचारा रहा कोरा ।
स्वातीका बूंद ही उसका सहारा । वही उसका पानी ॥ ८३ ॥
वैसे गुरु है सर्वत्र चहूँ ओर । किंतु कृष्ण ! मुझे तेरा ही आधार ।
रहने दो यह वचन विस्तार । कहो विभूतियोग ॥ ८४ ॥
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥
तेरी जो विभूति संपूर्ण । जिससे तू व्याप्त भुवन ।
कह तू दिव्य श्री कृष्ण । कृपा पूर्वक ॥ ८५ ॥
विभूति अपनी दिव्य मुझ अशेष तु कह ।
जिससे विश्व है सारा व्याप्त हो कर तू रहा ॥ १६ ॥
३१५ विभूति-चिंतनयोग
विभूति जो यहां समस्त । लोगोंमें व्याप्त है अनंत ।
जो है प्रधान औ' विख्यात । कर तू प्रकट ॥ ८६ ॥
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥
किस भांति जानूं तुझको । किस भांति गाऊं तुझको ।
विश्व रूप कहूँ तुझको । न होगा चिंतन ॥ ८७ ॥
अजी ! पीछे कहे जैसे । निज-भाव कहे वैसे ।
अभी सबिस्तर तैसे । कह तू एक बार ॥ ८८ ॥
किन भावोंका ले आधार । भजनेसे है सुखकर ।
कह वह मुझे सत्वर । विभूति-योग ॥ ८९ ॥
विस्तरेणाऽत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वंतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥
अर्जुनकी विभूति-विस्तार सुननेकी इच्छा—
मैंने पूछा जो विभूति । वहि कहो भूतपति ।
पुनः इसकी पुनरुक्ति । करना क्या ॥ १९० ॥
ऐसी आवे तो भाव कल्पना । उसको जाने दो जनार्दन ।
मुझ जैसेको अमृत पान । ना न कहलाता ॥ ९१ ॥
कालकूटका जो सहोदर । मृत्यु भयसे पिये अपार ।
किंतु चतुर्वेश पुरंदर । होते जाते हैं ॥ ९२ ॥
ऐसा वह क्षीराब्धिका रस । उसमें है अमृतका बास ।
उसके जो माधुर्य मृष्टांश । नहीं छोडा जाता ॥ ९३ ॥
उस अल्पामृतकी यह महता । उस सामान्यकी वह मधुरता ।
यहां तेरा वचन परमामृत । कहना क्या ॥ ९४ ॥
योगेश जानूं मैं कैसे तुझे चिंतनमें नित ।
कौन कौन स्वरूपोंमें करूं मैं तब चिंतन ॥ १७
योग-विभूति-विस्तार कह तू अपना निज ।
सुनके न अघाता मैं वचनामृत पानसे ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ३१६
मंदाराचलको न उतराना । क्षीर सागरको नहीं मथना ।
अनादि सिद्ध जो अमृत पीना । वह भी अनायास ॥ ९५ ॥
न है वह द्रव या बद्ध । न है वहां रस औ' गंध ।
वह मिलता नित्य-सिद्ध । स्मरते ही ॥ ९६ ॥
सुन कर होता निरास । निश्चित संसारका पाश ।
तथा आति नित्यता पास । अपने आप ॥ ९७ ॥
मिटती जन्म-मृत्युकी भाषा । भूल जाता सर्वस निःशेष ।
अंतर्बाह्य वह महा-सुख । बढ़ता जाता ॥ ९८ ॥
तथा दैवयोगसे होता सेवन । सेवनसे अमृत होता है प्राण ।
देता है स्वयं श्री कृष्ण भगवान । ना न कहता चित्त ॥ ९९ ॥
सहज भाता है चित्तको नाम । दर्शन होता रहता परम ।
तथा ज्ञान देता अमृतोपम । आनंद मगन हो ॥ २०० ॥
अनुभवता मैं कैसा सुख । कह न सकता परितोष ।
कथित कथन कृष्णमुख- । करता है आनंद ॥ १ ॥
आनादि भास्कर क्या बासी होता । अस्नात अग्नि अमंगल होता ।
नदी प्रवाह क्या पुराना होता । समय बीतनेसे ॥ २ ॥
सुन तेरे मंगल वचन । किया है नाद-ब्रह्म दर्शन ।
तथा कृष्णागरुके 'सुमन । बटोर लिये हैं ॥ ३ ॥
सुनकर पार्थके वचन । डुला कृष्णका अंतःकरण ।
कहता है भक्ति ज्ञान पूर्ण । सागर बना यह ॥ ४ ॥
प्रिय सखाके प्रेममें मस्त । उमड़ते स्नेहमें हो त्रस्त ।
कष्टसे संयत हो अनंत । बोलता क्या ॥ ५ ॥
भगवान उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥
सुन मैं कहता दिव्य मुख्य मुख्य विभूतियां ।
मेरा विभूति-विस्तार न टूटता कभी कहीं ॥ १९ ॥
३१७ विभूति-चिंतनयोग
भगवानकी अनंत विभूतियोंकी कल्पना—
मैं हूँ पितामहका पिता । स्मरनेसे भी है भूलता ।
कहता बाबा पांडुसुत । अच्छा किया तूने ॥ ६ ॥
बाबा ! कहता वह अर्जुनको । इसमें विस्मय नहीं हमको ।
शिशु हो कहा नहीं क्या नंदको । बाबा ! उसने ॥ ७ ॥
यहांका प्रसंग है ऐसे । प्रेमोद्रेकमें होता वैसे ।
कृष्ण कहता अर्जुनसे । सुन धनंजय ॥ ८ ॥
तूने पूछा है मेरी विभूति । अनंत हैं वे सुभद्रापति ।
मेरी होकर भी मेरी मति । न जानती उन्हें ॥ ९॥
शरीरमें रोम हैं किती । जिसका उसे न गिनती ।
वैसी ही है मेरी विभूति । अनगिनत मुझे ॥ २१० ॥
वैसा भी मैं कैसा कितना । ज्ञान नहीं मुझे अपना ।
सबसे रूढ जो प्रधान । कहता हूं तुझे ॥ ११ ॥
जिनको जाननेसे हे पार्थ । सभी जान लिया होता ।
बीज जब हाथमें है आता । आया वृक्ष जैसा ॥ १२ ॥
या स्वाधीन होनेसे उपवन । आते सभी वृक्ष फल सुमन ।
वैसे जान लिया कर चिंतन । आता चित्तमें विश्व ॥ १३ ॥
वैसे सच ही है धनुर्धर । अनंत है जो मेरा विस्तार ।
आकाशका जो महा विस्तार । छिप जाता मुझमें ॥ १४ ॥
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ २० ॥
कुंतलालक मस्तक सुन । धनुर्वेद त्र्यंबक अर्जुन ।
बसा मैं हियमें आत्मा बन । भूतमात्रके ॥ १५ ॥
अंदर भी मैं हूँ अंतःकरणमें । बाहर भी मैं आवरण रूपमें ।
मैं ही हूँ आदिमें तथा निर्वाणमें । मैं मध्यमें भी ॥ १६ ॥
हियमें सबके मैं हूँ बसता आत्म रूपसे ।
मैं आदि भूत मात्रोंको मध्य मैं और अंत भी ॥ २० ॥
ज्ञानेश्वरी ३१८
जैसे मेघ तलमें गगन । अंदर बाहर सूक्ष्म स्थान ।
आकाशमें इनका जनन । रहना भी वही ॥१७॥
फिर ये सब लय हो जाते । अकाश ही बनके रहते ।
वैसे आदि अंत लय होते । भूतमात्र मुझमें ॥ १८ ॥
ऐसा विविध व्यापक पन । मेरा विभूति विस्तार जान ।
जीवका कर तू अब कान । सुन जो सुना था ॥ १९ ॥
अब भी मेरी वे जो विभूति । सुनना है क्या सुभद्रापति ।
पुनरुक्ति करता सप्रीति । प्रधान रूपसे ॥ २२० ॥
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥
भगवानकी प्रधान ऐसी पिचत्तर विभूतियां —
यह कह बोला प्रेममें । मैं हूं विष्णु आदित्योंमें ।
तथा सूर्य ज्योतिर्वंतोंमें । जो है रश्मिवंत ॥ २१ ॥
मरीचि मैं मरुतोंमें । चंद्र मैं तारागणोंमें ।
बोले श्रीकृष्ण रणमें । गगन रंगके ॥ २२ ॥
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानांमस्मि वासवः ।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥
वेदोंमें मैं सामवेद । कहता वह गोविंद ।
देवोंमें मरुद्बंधु । महेंद्र हूँ मैं ॥ २३ ॥
इंद्रियोंमें मैं हूँ मन । जो है ग्यारहवा जान
भूतमात्रोंमें चेतन । स्वभावसे मैं ॥ २४ ॥
आदित्योंमें महा विष्णु सूर्य मैं ज्योतिमानमें ।
मरीचि मुख्य वायुमें नक्षत्रोंमें शशांक मैं ॥ २१ ॥
मैं सामवेद वेदोंमें देवोंमें देव-राज मैं ।
मन हूँ इंद्रियोंमें मैं चेतना भूत-मात्रमें ॥ २२ ॥
३१९ विभूति-चिंतनयोग
रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥
मैं हूँ रुद्रोंमें शंकर । कामसे जिसका वैर ।
निःसंशय धनुर्धर । निष्भ्रांत मान तू ॥ २५ ॥
यक्ष-रक्ष गणमें विख्यात । शंभुका मित्र जो धनवंत ।
वह कुबेर मैं हूँ अनंत । कहने लगा ॥ २६ ॥
वैसे ही मैं वसुओंमें । अग्नि हूँ जान मनमें ।
सर्वोव्य मैं शिखरोंमें । मेरू हूं गिरीश जो ॥ २७ ॥
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिं ।
सेनानिनामहं स्कंदः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ २५ ॥
स्वर्ग सिंहासन सहायक । सर्वश्रेष्ठ सर्वज्ञ जो नेक ।
पुरोहित स्वर्गका प्रमुख । मैं वह बृहस्पति ॥ २८ ॥
त्रिभुवनका श्रेष्ठ सेनापति । कहलाता स्कंद जो महामति ।
अग्नि कृत्तिका जान जो विभूति । शिव वीर्य से ॥ २९ ॥
विश्वके सकल सरोवरमें । जल राशिमें समुद्र रूपमें ।
तपोराशि हूँ मैं महर्षियोंमें । कहलाता भृगु मुनि ॥ ३० ॥
सकल अक्षरोंमें जो है श्रेष्ठ । जहां सत्योत्कर्ष परमोत्कट ।
ज्ञानी जन जिससे एक निष्ठा । वह ओंकार मैं हूँ ॥ ३१ ॥
कुबेर यक्ष रक्षोंमें रुद्रोंमें मैं सदाशिव ।
मेरू मैं गिरि-मालामें अग्नि मैं वसु वर्गमें ॥ २३ ॥
बृहस्पति मुझे जान पुरोहित प्रधान जो ।
स्कंद सेनाधिपोंमें मैं समुद्र जल-राशिमें ॥ २४ ॥
मैं एकाक्षर वाणीमें भृगु मैं ऋषि-वृंदमें ।
जप हूं सब यज्ञोंमें स्थावरोंमें हिमालय ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३२०
जो है समस्त यज्ञोंमें । जपयज्ञ मैं लोकमें ।
कर्म-त्याग प्रणवादिमें । नित्य होता ॥ ३२ ॥
अजी ! जप यज्ञ जो परम । बांध न सकते यज्ञादि कर्म ।
नामसे पावन धर्म-अधर्म । परब्रह्म वेदार्थ ॥ ३३ ॥
स्थावरोंमें जो पर्वत । पुण्य रूप रहा स्थित ।
पुण्य-पुंज हिमवंत । मैं हूँ जान तू ॥ ३४ ॥
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम् देवर्षीणां च नारदः ।
गंधर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलोमुनिः ॥ २६ ॥
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।
ऐरावतं गजेंद्राणाम् नराणां च नराधिपम् ॥ २७ ॥
कल्पद्रुम औ' पारिजात । गुणमें चंदन है ख्यात ।
फिर भी वृक्षोंमें अश्वत्थ । मेरी विभूति है ॥ ३५ ॥
देवऋषियोंमें मुझे पार्थ । जानना तू नारद यथार्थ ।
तथा गंधर्वोंमें चित्ररथ । मुझे ही जान ॥ ३६ ॥
सभी सिद्धोंमें महासिद्ध । कपिलाचार्य जो प्रबुद्ध ।
तुरंगोंमें जो हैं प्रसिद्ध । उच्चैःश्रव मैं ॥ ३७ ॥
गजोंमें मैं हूं राज-भूषण । ऐरावत स्वर्ग-भूषण ।
पय-राशि कर मंथन । निकाला अमृतांश ॥ ३८ ॥
यहां मैं नरोंमें जो राजा । विभूति विशेष सहज ।
जन कहलाते हैं प्रजा । जिसकी सब ॥ ३९ ॥
अश्वत्थ सब वृक्षोंमें देवर्षि बोच नारद ।
चित्ररथ गंधर्वों में सिद्धोंमें कपिलमुनि ॥ २६ ॥
उच्चैश्रवा अश्वोंमें मैं निकला जो अमृतसे ।
ऐरावत गजेंद्रोंमें नरोंमें मैं नराधिप ॥ २७ ॥
३२१ विभूति-चिंतनयोग
(41)
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
प्रजनश्चास्मि कंदर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ २८ ॥
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९ ॥
वज्र हूँ मैं हथियारोंमें । पकड़ता इंद्र करमें ।
जो शतमख करनेमें । होता है उत्तीर्ण ॥ ४० ॥
धेनुओंमें मैं कामधेनु । कहता कृष्ण भगवान ।
जन्मदात्रोंमें मैं मदन । जान तू यह ॥ ४१ ॥
सर्प कुलका अधिष्ठाता । वासुकि हूँ मैं कुंति-सुत ।
नागोंमें जो कहलाता । वह अनंत मैं हूँ ॥ ४२ ॥
जलराशी में पांडुसुत । पश्चिम प्रमदाका कांत ।
कहता है देवकी सुत । मैं हूँ वरुण ॥ ४३ ॥
तथा पितृगणोंमें समस्त । जो है अर्यमा पितृ-देवता ।
वह मैं ही यह तत्वता । जान तू अर्जुन ॥ ४४ ॥
जगका कर शुभाशुभ लेखन । तथा प्राणियोंके मनका दर्शन ।
तदनुरूप करते नियमन । पाप-पुण्य फलका ॥ ४५ ॥
उन नियमितोंमें यम । सर्व साक्षी रूप मैं धर्म ।
कहता यह आत्माराम । मैं हूँ वह ॥ ४६ ॥
प्रल्हादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्
मृगानां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥ ३० ॥
मैं कामधेनु गायोंमें शस्त्रोंमें वज्र मैं रहा ।
उत्पत्ति हेतु मैं काम मैं सर्पोत्तम वासुकी ॥ २८ ॥
मैं हूँ वरुण पानीमें नागोंमें शेष-नाग मैं ।
पितरोंमें अर्यमा हूँ यम संयम-कारक ॥ २९ ॥
मैं हूँ प्रह्लाद दैत्योंमें काल हूँ गणितज्ञमें ।
मृगोंमें मैं मृगराज पक्षियोंमें खगेंद्र हूँ ॥ ३० ॥
ज्ञानेश्वरी ३२२
दानव कुल तिलक। भक्त प्रल्हाद मैं नेक।
आसुरी गुणोंमें देख। न हुआ जो लिप्त ॥ ४७ ॥
ग्रासनेमें मैं महाकाल। कहता है वह गोपाल।
श्वापदोंमें मैं शार्दूल। जान तू यह ॥ ४८ ॥
पक्षि-जातिमें तू सुन। गरुड हूं मैं अर्जुन।
तभी तो वह आसन। हो सका मेरा ॥ ४९ ॥
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ॥
पृथिवीका है जो पसारा। क्षण भरमें धनुर्धर।
उङ्घाण जो सप्तसागर। करते रहते ॥ २५० ॥
ऐसे रहते जो गतिवंत। उनमें पवन मैं पांडुसुत।
शस्त्र-धारियोंमें जो हैं समस्त। श्रीराम मैं हूं ॥ ५१ ॥
पक्ष लेके संकटग्रस्त धर्मका। सहारा मात्र अपने धनुष्यका।
मोड़ लिया मुख विजय लक्ष्मीका। जिसने अपनी ओर ॥ ५२ ॥
चढ़कर पर्वत मस्तक सुवेली। प्रताप लंकेश्वरकी मस्तकावली।
आकाशस्त भूतोंको दी हस्त-बलि। जो चीखते थे ॥ ५३ ॥
बढाया उन्होंने देवोंका मान। किया धर्मका जीर्णोद्धार जान।
जनमा सूर्यवंशको महान। मानो सूर्य रूप ही ॥ ५४ ॥
ऐसा जो धनुर्बाण हस्त। रामचंद्र मैं सीता-कांत।
तथा मकर पुच्छवंत। मैं हूं जलचरोंमें ॥ ५५ ॥
अजी ! जान तू सकल जल ओघ। उसमें भगीरथकी लायी गंगा।
उसको निगले जन्हुकी जांघ। फाड आयी जो ॥ ५६ ॥
वह त्रिभुवनैक सरिता। जाह्नवी है सुन पांडुसुत।
जल प्रवाहोंमें समस्त। मेरी विभूति है ॥ ५७ ॥
राम मैं शस्त्र-वीरोंमें वायु मैं वेगवानमें।
मत्स्योंमें मैं बना नक्र नदियोंमें गंगा नदी ॥ ३१ ॥
३२३ विभूति-चिंतनयोग
ऐसी मेरी विभूति अनेक । उनका नाम लूं मैं एकेक ।
बीतेंगे सहस्र जन्म देख । सुननेमें ही ॥ ५८ ॥
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥ ३२ ॥
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥
नक्षत्र चुनना आकाशके पूर्ण । ऐसी अपेक्षा जब करेगा मन ।
तब पोटलीमें बांधना गगन । यही है अच्छा ॥ ५९ ॥
यदि पृथ्वीके परमाणु गिनना । तो पृथ्वीको ही बगलमें दबाना ।
वैसा विस्तार यदि मेरा जानना । तो मेरे ही ज्ञानसे ॥ २६० ॥
जैसे शाखाओंके फूल फल । बटोरना चाहे तो सकल ।
उखाडना वृक्ष सहमूल । लेना हाथमें ॥ ६१ ॥
वैसी मेरी विभूति विशेष । जानना चाहे यदि अशेष ।
मेरा स्वरूप एक निर्दोष । जानना होगा ॥ ६२ ॥
अन्यथा भिन्न भिन्न विभूति । कहूँ कितनी सुभद्रापति ।
एक बातमें ही जान महामति । मैं हूँ सर्वस्व ॥ ६३ ॥
मैं हूं संपूर्ण सृष्टिमें । अजी ! आदि मध्यांतमें ।
होते हैं जैसे पटमें । तंतु ही तंतु ॥ ६४ ॥
व्यापक ऐसे मुझे जानना । विभूति-भेद है क्या करना ।
तुझमें योग्यताका न होना । सो कहना पड़ा ॥ ६५ ॥
या तूने पूछ लिया है पार्थ । इसीलिये कहता विस्तृत ।
विद्याओंमें जान तू प्रस्तुत । मैं हूँ आत्म-विद्या ॥ ६६ ॥
आदि मध्य तथा अंत मैं चराचर सृष्टिका ।
विद्यामें आत्म-विद्या मैं वादिका तत्व-वाद मैं ॥ ३२ ॥
मैं हूँ द्वंद्व समासोंमें अक्षरोंमें अकार मैं ।
मैं ही अक्षय जो काल विश्वकर्ता विराट् स्वयम् ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ३२४
वाद जो है बोलनेवालोंमें । जान तू वह हूँ मैं संक्षेपमें ।
कभी न आते एक मतमें । जिससे शास्त्र ॥ ६७ ॥
विषय-निश्चयमें जो बढता । सुनके तर्कका जोर चढता ।
तथा वाणीका रस है बढता । औ' होता मधुर भाषण ॥ ६८ ॥
ऐसे प्रतिपादनमें वाद । कहता है मैं ही हूँ गोविंद ।
औ' अक्षरोंमें जो विशद् । वह अकार मैं हूँ ॥ ६९ ॥
वैसे समासमें अर्जुन । द्वंद्व समास मैं हूँ जान ।
करता जो सर्व भक्षण । वह काल मैं हूँ ॥ २७० ॥
जिसमें मेरु मंदार सहित । पृथिवी भी हो जाती द्रवित ।
उस एकार्णवको भी जो पार्थ । पचाता अपनेमें ॥ ७१ ॥
उस प्रलय तेजको भी ग्रासता । तथा महा अनिलको निगलता ।
आकाशको भी अपनेमें समाता । धनंजय ॥ ७२ ॥
ऐसा है जो असीम काल । मैं हूँ कहता है गोपाल ।
सृजता विश्व जो निर्मल । वह ब्रह्मा मैं हूँ ॥ ७३ ॥
मृत्युः सर्व हरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीवाक् च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४॥
तथा उत्पन्न भूतोंका धारण । सबका जीवन भी संपूर्ण ।
अंतमें सबको देता मरण । वह भी मैं हूँ ॥ ७४ ॥
स्त्री जातिमें अर्जुन । सात मेरी है सुन ।
कहता वह कौन । सकौतुक ॥ ७५ ॥
सुन नित्य नूतन कीर्ति । अर्जुन वह मेरी मूर्ति ।
तथा स-औदार्य संपत्ति । मैं हूँ जान ॥ ७६ ॥
तथा वह है जो वाणी । न्याय सुआसन वासिनी ।
औ' विवेक-पथ गामिनी । मेरा ही रूप ॥ ७७ ॥
सर्व नाशक मैं मृत्यु जन्म भी मैं भविष्यका ।
वाणी श्री कीर्ति नारीमें क्षमा मेधा धृति स्मृति ॥ ३४॥
३२५
विभूति-चिंतनयोग