ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥
मैं हूँ रुद्रोंमें शंकर । कामसे जिसका वैर ।
निःसंशय धनुर्धर । निष्भ्रांत मान तू ॥ २५ ॥
यक्ष-रक्ष गणमें विख्यात । शंभुका मित्र जो धनवंत ।
वह कुबेर मैं हूँ अनंत । कहने लगा ॥ २६ ॥
वैसे ही मैं वसुओंमें । अग्नि हूँ जान मनमें ।
सर्वोव्य मैं शिखरोंमें । मेरू हूं गिरीश जो ॥ २७ ॥
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिं ।
सेनानिनामहं स्कंदः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ २५ ॥
स्वर्ग सिंहासन सहायक । सर्वश्रेष्ठ सर्वज्ञ जो नेक ।
पुरोहित स्वर्गका प्रमुख । मैं वह बृहस्पति ॥ २८ ॥
त्रिभुवनका श्रेष्ठ सेनापति । कहलाता स्कंद जो महामति ।
अग्नि कृत्तिका जान जो विभूति । शिव वीर्य से ॥ २९ ॥
विश्वके सकल सरोवरमें । जल राशिमें समुद्र रूपमें ।
तपोराशि हूँ मैं महर्षियोंमें । कहलाता भृगु मुनि ॥ ३० ॥
सकल अक्षरोंमें जो है श्रेष्ठ । जहां सत्योत्कर्ष परमोत्कट ।
ज्ञानी जन जिससे एक निष्ठा । वह ओंकार मैं हूँ ॥ ३१ ॥
कुबेर यक्ष रक्षोंमें रुद्रोंमें मैं सदाशिव ।
मेरू मैं गिरि-मालामें अग्नि मैं वसु वर्गमें ॥ २३ ॥
बृहस्पति मुझे जान पुरोहित प्रधान जो ।
स्कंद सेनाधिपोंमें मैं समुद्र जल-राशिमें ॥ २४ ॥
मैं एकाक्षर वाणीमें भृगु मैं ऋषि-वृंदमें ।
जप हूं सब यज्ञोंमें स्थावरोंमें हिमालय ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३२०