ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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पृष्ठ 376, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 376प्रथम है जान तू बुद्धि । फिर ज्ञान जो निरवधि ।
प्रथम है जान तू बुद्धि । फिर ज्ञान जो निरवधि ।
असंमोह सहन सिद्धि । क्षमा सत्य ॥ ८३ ॥
तब इंद्रिय मन दमन । सुख दुखमें समवर्तन ।
भाव अभाव मान अर्जुन । मेरे ही विकार ॥ ८४ ॥
भय तथा अभयता । अहिंसा तथा समता ।
मेरा रूप पांडुसुत । जान तू यह ॥ ८५ ॥
दान यश अपकीर्ति । इन भावोंकी वसती ।
मेरी ओरसे है होती । सब भूतोंमें ॥ ८६ ॥
जैसे भूत जात भिन्न भिन्न । वैसे मेरे गुण भी है जान ।
होते मेरे ज्ञानसे उत्पन्न । कुछ अज्ञानसे भी ॥ ८७ ॥
जैसे प्रकाश औ' अंधार । लेकर सूर्यका ही आधार ।
फैलता अस्तमें है अंधार । उदयमें वैसे प्रकाश ॥ ८८ ॥
मेरा ज्ञान और अज्ञान । है जो दैवके ही कारण ।
तभी भूतोंमें भाव जान । कम और अधिक ॥ ८९ ॥
तभी जीव सृष्टि संपूर्ण । मेरे ही विकारमें तू जान ।
उलझी हुई यहां अर्जुन । जान तू यह ॥ ९० ॥
अब इस सृष्टिके पालक । जिसके आधीन होते लोक ।
वे ग्यारह भाव भिन्न देख । कहता तुझे ॥ ९१ ॥
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥
संपूर्ण गुणसे जो वृद्ध । औ' महर्षियोंमें प्रबुद्ध ।
जो हैं कश्यपादि प्रसिद्ध । सप्त-ऋषी ॥ ९२ ॥
चौदह मनु जो विख्यात । उसमें चार प्रतिष्ठित ।
स्वयंभू आदि ख्याति प्राप्त । कहे हैं अन्य ॥ ९३ ॥
महर्षि सात आदीके मनु जो चार हैं तथा ।
मेरे संकल्पसे भाव लोकमें उनकी प्रजा ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ३०६