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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 383

उन ऋषियोंने जो कहा था । अनुभवमें आयी सत्यता ।
कृपया आपने सुनाया था । इसीलिये अब ॥ ५४ ॥
आता था देव-ऋषि नारद । गाता था ऐसे बचन छंद ।
गानेका ही लेकर आनंद । खो देते थे अर्थ ॥ ५५ ॥
प्रकट हुए यदि भास्कर । अंधोंके ही गांवमें आकर ।
बिना उष्णताके तापकर । देखें प्रकाश कैसे ॥ ५६ ॥
सुन देवर्षि नारदका अध्यात्म-गान । उससे केवल नाद-माधुर्य ही सुन ।
चितसे न कर उसका सार-ग्रहण । छोड देते थे ॥ ५७ ॥
असित देवलके मुखसे । सुना है तेरा चरित्र ऐसे ।
किंतु चित्त विषय-विषसे । था अति ग्रस्त ॥ ५८ ॥
विषय-विष होता भयंकर । तीता विषय है अति मधुर ।
तथा परमार्थ होता मधुर । लगता तीता ही ॥ ५९ ॥
अजी ! औरोंका क्या कहना । भवनमें तेरा गुण गाना ।
व्यास देवका नित सुनाना । तेरा चरित्र श्रेष्ठ ॥ १६० ॥
अंधारमें चिंतामणि देखा । उपेक्षासे नहीं उठा सका ।
उजालेमें पहचान सका । ऐसे ही है यह ॥ ६१ ॥
वैसे व्यासादिकोंके वचन । मेरी भी जो चिद्रत्नोंकी खान ।
उपेक्षित पड़ी थी श्रीकृष्ण । बिना प्रकाशके ॥ ६२ ॥
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हिते भगवन् व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥ १४ ॥
फैले तेरे वाक्सूर्य किरण । ऋषि-वाक्योंका हुआ स्मरण ।
मिटा सब अपरिचितपन । तेरी कृपासे ॥ ६३ ॥
ज्ञान-बीज रूप थे उनके बोल । हृदय-भूमिमें जमे थे सकल ।
उसपे तेरी कृपाका यह ओल । संवाद फल आया ॥ ६४ ॥
मानता सत्य ये सारा स्वयं तू कहता मुझे ।
देव दानव कोयी भी तेरा रूप न जानते ॥ १४ ॥
(40) ३१३ विभूति-चिंतनयोग