ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंममता दृष्टिका आच्छादन कर । जैसे दौडती है माता धनुर्धर
शिशुके पीछे सदा बद्ध होकर । रहता जो क्रीडारत ॥ ३४ ॥
शिशु जब जो जो खेल दिखाता । उसे स्वर्णमय करती माता ।
वैसे भक्तका प्रभुत्व बढाता । मैं उपासनामें ॥ ३५ ॥
उस उपासना पोषणसे । भक्त मिलन होगा मुझसे ।
देखता है इस भांतिसे । भाता है मुझे ॥ ३६ ॥
अजी ! भक्तकी मुझे है आस । उसकी एक-निष्ठाकी प्यास ।
प्रेमी भक्तोंका अकाल खास । रहता मेरे यहां ॥ ३७ ॥
स्वर्ग औ' मोक्षके पथ । छोड दिये उन्हींके हाथ ।
दिया तन लक्ष्मीके साथ । शेषके आधीन ॥ ३८ ॥
अपने पास केवल एक । रखा है निर्मल प्रेम-सुख ।
वह प्रेमियोंके लिये देख । किया जतन ॥ ३९ ॥
जैसे कहा मैंने अब तक । देखके अपनत्व नेक ।
लेते प्रेमियोंका प्रेम एक । जो शब्दसे परे ॥ ४० ॥
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ ११ ॥
मुझ आत्मामें ही प्रेम-भाव । जिन्होंने किया जीनेका ठाव ।
उसके बिना अन्य पांडव । सब है व्यर्थ ॥ ४१ ॥
ऐसे प्रिय तत्वज्ञोंके सम्मुख । कर्पूर मशाल हाथमें रख ।
चलता हूं मैं आगे आगे देख । राह दिखाते ॥ ४२ ॥
उनको अज्ञान रातमें । घिरे हुए घने तममें ।
दूर कर तम राहमें । करता नित्योदय ॥ ४३ ॥
अर्जुनको कृष्ण परब्रह्म होनेका भास ---
प्रिय भक्तोंका प्रियतम । बोला जब पुरुषोत्तम ।
कहा अर्जुनने सप्रेम । मन हुआ शांत ॥ ४४ ॥
करुणा करके मैं ही हियमें रहके नित ।
तेजस्वी ज्ञान ज्योतीसे अज्ञान तम नाशता ॥ ११ ॥
३११ विभूति-चिंतनयोग