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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 386

विभूति जो यहां समस्त । लोगोंमें व्याप्त है अनंत ।
जो है प्रधान औ' विख्यात । कर तू प्रकट ॥ ८६ ॥
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥
किस भांति जानूं तुझको । किस भांति गाऊं तुझको ।
विश्व रूप कहूँ तुझको । न होगा चिंतन ॥ ८७ ॥
अजी ! पीछे कहे जैसे । निज-भाव कहे वैसे ।
अभी सबिस्तर तैसे । कह तू एक बार ॥ ८८ ॥
किन भावोंका ले आधार । भजनेसे है सुखकर ।
कह वह मुझे सत्वर । विभूति-योग ॥ ८९ ॥
विस्तरेणाऽत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वंतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥
अर्जुनकी विभूति-विस्तार सुननेकी इच्छा—
मैंने पूछा जो विभूति । वहि कहो भूतपति ।
पुनः इसकी पुनरुक्ति । करना क्या ॥ १९० ॥
ऐसी आवे तो भाव कल्पना । उसको जाने दो जनार्दन ।
मुझ जैसेको अमृत पान । ना न कहलाता ॥ ९१ ॥
कालकूटका जो सहोदर । मृत्यु भयसे पिये अपार ।
किंतु चतुर्वेश पुरंदर । होते जाते हैं ॥ ९२ ॥
ऐसा वह क्षीराब्धिका रस । उसमें है अमृतका बास ।
उसके जो माधुर्य मृष्टांश । नहीं छोडा जाता ॥ ९३ ॥
उस अल्पामृतकी यह महता । उस सामान्यकी वह मधुरता ।
यहां तेरा वचन परमामृत । कहना क्या ॥ ९४ ॥
योगेश जानूं मैं कैसे तुझे चिंतनमें नित ।
कौन कौन स्वरूपोंमें करूं मैं तब चिंतन ॥ १७
योग-विभूति-विस्तार कह तू अपना निज ।
सुनके न अघाता मैं वचनामृत पानसे ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ३१६