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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 395

वाद जो है बोलनेवालोंमें । जान तू वह हूँ मैं संक्षेपमें ।
कभी न आते एक मतमें । जिससे शास्त्र ॥ ६७ ॥
विषय-निश्चयमें जो बढता । सुनके तर्कका जोर चढता ।
तथा वाणीका रस है बढता । औ' होता मधुर भाषण ॥ ६८ ॥
ऐसे प्रतिपादनमें वाद । कहता है मैं ही हूँ गोविंद ।
औ' अक्षरोंमें जो विशद् । वह अकार मैं हूँ ॥ ६९ ॥
वैसे समासमें अर्जुन । द्वंद्व समास मैं हूँ जान ।
करता जो सर्व भक्षण । वह काल मैं हूँ ॥ २७० ॥
जिसमें मेरु मंदार सहित । पृथिवी भी हो जाती द्रवित ।
उस एकार्णवको भी जो पार्थ । पचाता अपनेमें ॥ ७१ ॥
उस प्रलय तेजको भी ग्रासता । तथा महा अनिलको निगलता ।
आकाशको भी अपनेमें समाता । धनंजय ॥ ७२ ॥
ऐसा है जो असीम काल । मैं हूँ कहता है गोपाल ।
सृजता विश्व जो निर्मल । वह ब्रह्मा मैं हूँ ॥ ७३ ॥
मृत्युः सर्व हरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीवाक् च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४॥
तथा उत्पन्न भूतोंका धारण । सबका जीवन भी संपूर्ण ।
अंतमें सबको देता मरण । वह भी मैं हूँ ॥ ७४ ॥
स्त्री जातिमें अर्जुन । सात मेरी है सुन ।
कहता वह कौन । सकौतुक ॥ ७५ ॥
सुन नित्य नूतन कीर्ति । अर्जुन वह मेरी मूर्ति ।
तथा स-औदार्य संपत्ति । मैं हूँ जान ॥ ७६ ॥
तथा वह है जो वाणी । न्याय सुआसन वासिनी ।
औ' विवेक-पथ गामिनी । मेरा ही रूप ॥ ७७ ॥
सर्व नाशक मैं मृत्यु जन्म भी मैं भविष्यका ।
वाणी श्री कीर्ति नारीमें क्षमा मेधा धृति स्मृति ॥ ३४॥
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विभूति-चिंतनयोग