ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसी मेरी विभूति अनेक । उनका नाम लूं मैं एकेक ।
बीतेंगे सहस्र जन्म देख । सुननेमें ही ॥ ५८ ॥
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥ ३२ ॥
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥
नक्षत्र चुनना आकाशके पूर्ण । ऐसी अपेक्षा जब करेगा मन ।
तब पोटलीमें बांधना गगन । यही है अच्छा ॥ ५९ ॥
यदि पृथ्वीके परमाणु गिनना । तो पृथ्वीको ही बगलमें दबाना ।
वैसा विस्तार यदि मेरा जानना । तो मेरे ही ज्ञानसे ॥ २६० ॥
जैसे शाखाओंके फूल फल । बटोरना चाहे तो सकल ।
उखाडना वृक्ष सहमूल । लेना हाथमें ॥ ६१ ॥
वैसी मेरी विभूति विशेष । जानना चाहे यदि अशेष ।
मेरा स्वरूप एक निर्दोष । जानना होगा ॥ ६२ ॥
अन्यथा भिन्न भिन्न विभूति । कहूँ कितनी सुभद्रापति ।
एक बातमें ही जान महामति । मैं हूँ सर्वस्व ॥ ६३ ॥
मैं हूं संपूर्ण सृष्टिमें । अजी ! आदि मध्यांतमें ।
होते हैं जैसे पटमें । तंतु ही तंतु ॥ ६४ ॥
व्यापक ऐसे मुझे जानना । विभूति-भेद है क्या करना ।
तुझमें योग्यताका न होना । सो कहना पड़ा ॥ ६५ ॥
या तूने पूछ लिया है पार्थ । इसीलिये कहता विस्तृत ।
विद्याओंमें जान तू प्रस्तुत । मैं हूँ आत्म-विद्या ॥ ६६ ॥
आदि मध्य तथा अंत मैं चराचर सृष्टिका ।
विद्यामें आत्म-विद्या मैं वादिका तत्व-वाद मैं ॥ ३२ ॥
मैं हूँ द्वंद्व समासोंमें अक्षरोंमें अकार मैं ।
मैं ही अक्षय जो काल विश्वकर्ता विराट् स्वयम् ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ३२४