ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 385, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीव स्व-सामर्थ्यसे ईश्वरको नहीं जान सकता—
जैसे अपनी विशालता गगन । आप ही जानता संपूर्ण रूपेण ।
अथवा जैसे अपना हो सपना । जानती पृथ्वी ॥ ७६ ॥
वैसे अपनी सर्वशक्ति । जानता तू ही लक्ष्मीपति ।
यहां वेदादिककी मति । अकडती व्यर्थ ॥ ७७ ॥
दौडनेमें जीतना मनको । आंकना हाथसे पवनको ।
पार करना आदि शून्यको । कैसे संभव ॥ ७८ ॥
ऐसा है तुझे जानना । उसको कह सकना ।
असंभव तेरे बिना । अन्य किसीको ॥ ७९ ॥
तू ही जानता अपनी बात । कहनेमें भी तू ही समर्थ ।
देव ! मेरे माथे का तू आर्त- । पसीना पोंछ दे ॥ १८० ॥
सुना क्या यह भूत-भावन । त्रिभुवन-गज-पंचानन ।
सकल देव-देवतार्चन । जगन्नायक ॥ ८१ ॥
जानना चाहें तो तेरा बड़प्पन । उसके सम्मुख हम रजकण ।
यह जान हुए तो सलज्ज मौन । नहीं अन्य उपाय ॥ ८२ ॥
चहूँ ओर सरिता सागर भरा । किंतु चातक बेचारा रहा कोरा ।
स्वातीका बूंद ही उसका सहारा । वही उसका पानी ॥ ८३ ॥
वैसे गुरु है सर्वत्र चहूँ ओर । किंतु कृष्ण ! मुझे तेरा ही आधार ।
रहने दो यह वचन विस्तार । कहो विभूतियोग ॥ ८४ ॥
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥
तेरी जो विभूति संपूर्ण । जिससे तू व्याप्त भुवन ।
कह तू दिव्य श्री कृष्ण । कृपा पूर्वक ॥ ८५ ॥
विभूति अपनी दिव्य मुझ अशेष तु कह ।
जिससे विश्व है सारा व्याप्त हो कर तू रहा ॥ १६ ॥
३१५ विभूति-चिंतनयोग