ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे प्रयाग है समरसका । संगम प्रवाह सात्विकताका ।
हुआ जो सुसंवाद चौराहका । गणपति ही मानो ॥ २४ ॥
तब है महा सुखके नशेमें । उडे देह-ग्रामके बाहरमें ।
आत्म-तृप्तिके गर्जनानंदमें । गूंजता गगन ॥ २५ ॥
गुरु शिष्यका एकांत-स्थल । वहां भी देखके देश-काल ।
कहनेकी बात जो मंगल । गरजते हैं मेघ-से ॥ २६ ॥
पूरा खिला हुआ जो कमल । समा न सकता परिमळ ।
अभेद रूप देता प्रफुल्ल । आमोदोन्माद ॥ २७ ॥
सदा सर्वत्र मेरा गुणवर्णन । औ' वर्णनानंदमें खो जाता कथन ।
उस खोनेमें घुलते तन मन । जीव सहित ॥ २८ ॥
जीत लिया मत्सुख पूर्ण । प्रेमोत्कर्षमें हों बे-भान ।
भूले देश-काल भी पूर्ण । अपनेमें ही ॥ २९ ॥
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १० ॥
भक्त केवल मेरा प्रेम-सुख चाहते हैं—
हमको उन्हे जो कुछ देना था । उन्होने पहले ही पालिया था ।
हमारे दिये बिना कमाया था । फिर रहा क्या देनेको ॥ १३० ॥
उनका जो निश्चित पथ । उसके सम्मुख हे पार्थ ।
स्वर्ग-मोक्ष आदिके पथ । जैसी पगडंडियां ॥ ३१ ॥
अंगीकार किया उन्होंने प्रेम । दे देना है जो हमारा नियम ।
कर लिया उन्होंने वही काम । नाम लिया हमारा ॥ ३२ ॥
अनुदिन वह बढते जाये । कालकी दृष्टि नहीं पड पाये ।
इतना ही काम हमारे लिये । रहता है तब ॥ ३३ ॥
ऐसे मगन जो नित्य भजते प्रीति-पूर्वक ।
देता उन्हे बुद्धि योग जिससे मैं मिलूं उन्हे ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी ३१०