ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 388, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंभगवानकी अनंत विभूतियोंकी कल्पना—
मैं हूँ पितामहका पिता । स्मरनेसे भी है भूलता ।
कहता बाबा पांडुसुत । अच्छा किया तूने ॥ ६ ॥
बाबा ! कहता वह अर्जुनको । इसमें विस्मय नहीं हमको ।
शिशु हो कहा नहीं क्या नंदको । बाबा ! उसने ॥ ७ ॥
यहांका प्रसंग है ऐसे । प्रेमोद्रेकमें होता वैसे ।
कृष्ण कहता अर्जुनसे । सुन धनंजय ॥ ८ ॥
तूने पूछा है मेरी विभूति । अनंत हैं वे सुभद्रापति ।
मेरी होकर भी मेरी मति । न जानती उन्हें ॥ ९॥
शरीरमें रोम हैं किती । जिसका उसे न गिनती ।
वैसी ही है मेरी विभूति । अनगिनत मुझे ॥ २१० ॥
वैसा भी मैं कैसा कितना । ज्ञान नहीं मुझे अपना ।
सबसे रूढ जो प्रधान । कहता हूं तुझे ॥ ११ ॥
जिनको जाननेसे हे पार्थ । सभी जान लिया होता ।
बीज जब हाथमें है आता । आया वृक्ष जैसा ॥ १२ ॥
या स्वाधीन होनेसे उपवन । आते सभी वृक्ष फल सुमन ।
वैसे जान लिया कर चिंतन । आता चित्तमें विश्व ॥ १३ ॥
वैसे सच ही है धनुर्धर । अनंत है जो मेरा विस्तार ।
आकाशका जो महा विस्तार । छिप जाता मुझमें ॥ १४ ॥
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ २० ॥
कुंतलालक मस्तक सुन । धनुर्वेद त्र्यंबक अर्जुन ।
बसा मैं हियमें आत्मा बन । भूतमात्रके ॥ १५ ॥
अंदर भी मैं हूँ अंतःकरणमें । बाहर भी मैं आवरण रूपमें ।
मैं ही हूँ आदिमें तथा निर्वाणमें । मैं मध्यमें भी ॥ १६ ॥
हियमें सबके मैं हूँ बसता आत्म रूपसे ।
मैं आदि भूत मात्रोंको मध्य मैं और अंत भी ॥ २० ॥
ज्ञानेश्वरी ३१८