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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 389

जैसे मेघ तलमें गगन । अंदर बाहर सूक्ष्म स्थान ।
आकाशमें इनका जनन । रहना भी वही ॥१७॥
फिर ये सब लय हो जाते । अकाश ही बनके रहते ।
वैसे आदि अंत लय होते । भूतमात्र मुझमें ॥ १८ ॥
ऐसा विविध व्यापक पन । मेरा विभूति विस्तार जान ।
जीवका कर तू अब कान । सुन जो सुना था ॥ १९ ॥
अब भी मेरी वे जो विभूति । सुनना है क्या सुभद्रापति ।
पुनरुक्ति करता सप्रीति । प्रधान रूपसे ॥ २२० ॥
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥
भगवानकी प्रधान ऐसी पिचत्तर विभूतियां —
यह कह बोला प्रेममें । मैं हूं विष्णु आदित्योंमें ।
तथा सूर्य ज्योतिर्वंतोंमें । जो है रश्मिवंत ॥ २१ ॥
मरीचि मैं मरुतोंमें । चंद्र मैं तारागणोंमें ।
बोले श्रीकृष्ण रणमें । गगन रंगके ॥ २२ ॥
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानांमस्मि वासवः ।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥
वेदोंमें मैं सामवेद । कहता वह गोविंद ।
देवोंमें मरुद्बंधु । महेंद्र हूँ मैं ॥ २३ ॥
इंद्रियोंमें मैं हूँ मन । जो है ग्यारहवा जान
भूतमात्रोंमें चेतन । स्वभावसे मैं ॥ २४ ॥
आदित्योंमें महा विष्णु सूर्य मैं ज्योतिमानमें ।
मरीचि मुख्य वायुमें नक्षत्रोंमें शशांक मैं ॥ २१ ॥
मैं सामवेद वेदोंमें देवोंमें देव-राज मैं ।
मन हूँ इंद्रियोंमें मैं चेतना भूत-मात्रमें ॥ २२ ॥
३१९ विभूति-चिंतनयोग