सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 391

जो है समस्त यज्ञोंमें । जपयज्ञ मैं लोकमें ।
कर्म-त्याग प्रणवादिमें । नित्य होता ॥ ३२ ॥
अजी ! जप यज्ञ जो परम । बांध न सकते यज्ञादि कर्म ।
नामसे पावन धर्म-अधर्म । परब्रह्म वेदार्थ ॥ ३३ ॥
स्थावरोंमें जो पर्वत । पुण्य रूप रहा स्थित ।
पुण्य-पुंज हिमवंत । मैं हूँ जान तू ॥ ३४ ॥
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम् देवर्षीणां च नारदः ।
गंधर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलोमुनिः ॥ २६ ॥
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।
ऐरावतं गजेंद्राणाम् नराणां च नराधिपम् ॥ २७ ॥
कल्पद्रुम औ' पारिजात । गुणमें चंदन है ख्यात ।
फिर भी वृक्षोंमें अश्वत्थ । मेरी विभूति है ॥ ३५ ॥
देवऋषियोंमें मुझे पार्थ । जानना तू नारद यथार्थ ।
तथा गंधर्वोंमें चित्ररथ । मुझे ही जान ॥ ३६ ॥
सभी सिद्धोंमें महासिद्ध । कपिलाचार्य जो प्रबुद्ध ।
तुरंगोंमें जो हैं प्रसिद्ध । उच्चैःश्रव मैं ॥ ३७ ॥
गजोंमें मैं हूं राज-भूषण । ऐरावत स्वर्ग-भूषण ।
पय-राशि कर मंथन । निकाला अमृतांश ॥ ३८ ॥
यहां मैं नरोंमें जो राजा । विभूति विशेष सहज ।
जन कहलाते हैं प्रजा । जिसकी सब ॥ ३९ ॥
अश्वत्थ सब वृक्षोंमें देवर्षि बोच नारद ।
चित्ररथ गंधर्वों में सिद्धोंमें कपिलमुनि ॥ २६ ॥
उच्चैश्रवा अश्वोंमें मैं निकला जो अमृतसे ।
ऐरावत गजेंद्रोंमें नरोंमें मैं नराधिप ॥ २७ ॥
३२१ विभूति-चिंतनयोग
(41)