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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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मंदाराचलको न उतराना । क्षीर सागरको नहीं मथना ।
अनादि सिद्ध जो अमृत पीना । वह भी अनायास ॥ ९५ ॥
न है वह द्रव या बद्ध । न है वहां रस औ' गंध ।
वह मिलता नित्य-सिद्ध । स्मरते ही ॥ ९६ ॥
सुन कर होता निरास । निश्चित संसारका पाश ।
तथा आति नित्यता पास । अपने आप ॥ ९७ ॥
मिटती जन्म-मृत्युकी भाषा । भूल जाता सर्वस निःशेष ।
अंतर्बाह्य वह महा-सुख । बढ़ता जाता ॥ ९८ ॥
तथा दैवयोगसे होता सेवन । सेवनसे अमृत होता है प्राण ।
देता है स्वयं श्री कृष्ण भगवान । ना न कहता चित्त ॥ ९९ ॥
सहज भाता है चित्तको नाम । दर्शन होता रहता परम ।
तथा ज्ञान देता अमृतोपम । आनंद मगन हो ॥ २०० ॥
अनुभवता मैं कैसा सुख । कह न सकता परितोष ।
कथित कथन कृष्णमुख- । करता है आनंद ॥ १ ॥
आनादि भास्कर क्या बासी होता । अस्नात अग्नि अमंगल होता ।
नदी प्रवाह क्या पुराना होता । समय बीतनेसे ॥ २ ॥
सुन तेरे मंगल वचन । किया है नाद-ब्रह्म दर्शन ।
तथा कृष्णागरुके 'सुमन । बटोर लिये हैं ॥ ३ ॥
सुनकर पार्थके वचन । डुला कृष्णका अंतःकरण ।
कहता है भक्ति ज्ञान पूर्ण । सागर बना यह ॥ ४ ॥
प्रिय सखाके प्रेममें मस्त । उमड़ते स्नेहमें हो त्रस्त ।
कष्टसे संयत हो अनंत । बोलता क्या ॥ ५ ॥
भगवान उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥
सुन मैं कहता दिव्य मुख्य मुख्य विभूतियां ।
मेरा विभूति-विस्तार न टूटता कभी कहीं ॥ १९ ॥
३१७ विभूति-चिंतनयोग

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