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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 392

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
प्रजनश्चास्मि कंदर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ २८ ॥
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९ ॥
वज्र हूँ मैं हथियारोंमें । पकड़ता इंद्र करमें ।
जो शतमख करनेमें । होता है उत्तीर्ण ॥ ४० ॥
धेनुओंमें मैं कामधेनु । कहता कृष्ण भगवान ।
जन्मदात्रोंमें मैं मदन । जान तू यह ॥ ४१ ॥
सर्प कुलका अधिष्ठाता । वासुकि हूँ मैं कुंति-सुत ।
नागोंमें जो कहलाता । वह अनंत मैं हूँ ॥ ४२ ॥
जलराशी में पांडुसुत । पश्चिम प्रमदाका कांत ।
कहता है देवकी सुत । मैं हूँ वरुण ॥ ४३ ॥
तथा पितृगणोंमें समस्त । जो है अर्यमा पितृ-देवता ।
वह मैं ही यह तत्वता । जान तू अर्जुन ॥ ४४ ॥
जगका कर शुभाशुभ लेखन । तथा प्राणियोंके मनका दर्शन ।
तदनुरूप करते नियमन । पाप-पुण्य फलका ॥ ४५ ॥
उन नियमितोंमें यम । सर्व साक्षी रूप मैं धर्म ।
कहता यह आत्माराम । मैं हूँ वह ॥ ४६ ॥
प्रल्हादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्
मृगानां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥ ३० ॥
मैं कामधेनु गायोंमें शस्त्रोंमें वज्र मैं रहा ।
उत्पत्ति हेतु मैं काम मैं सर्पोत्तम वासुकी ॥ २८ ॥
मैं हूँ वरुण पानीमें नागोंमें शेष-नाग मैं ।
पितरोंमें अर्यमा हूँ यम संयम-कारक ॥ २९ ॥
मैं हूँ प्रह्लाद दैत्योंमें काल हूँ गणितज्ञमें ।
मृगोंमें मैं मृगराज पक्षियोंमें खगेंद्र हूँ ॥ ३० ॥
ज्ञानेश्वरी ३२२