ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसे एकादश ये समस्त । मेरे मनसे ही है निर्मित ।
सृष्टि व्यापार संचलनार्थ । धनुर्धर ॥ ९४ ॥
न हुए थे लोक व्यवस्थित । ये त्रिभुवन अनधिष्ठित ।
तथा यह सब भूतजात । जो था पडा हुआ ॥ ९५ ॥
तभी हुए ये ग्यारह उत्पन्न । उन्होने ही लोकपाल निर्माण ।
करके उनको अध्यक्ष जान । रखा यहां ॥ ९६ ॥
इसलिये ये ग्यारह राजा । उनके रहे अनेक प्रजा ।
है विस्तार यह सजा-धजा । मेरा ही सारा ॥ ९७ ॥
पहले होता है बीज एक । वही बनता तना नेक ।
उसमें ही अंकुर अनेक । निकलते हैं ॥ ९८ ॥
उस अंकुरके अनेक । निकलते शाखोपशाख ।
शाखाओंमें फुटते देख । असंख्य पल्लव ॥ ९९ ॥
उन पल्लवोंमें फल फूल । वृक्षत्व बहरता सकल ।
चिंतन रतको है केवल । बीज-मात्र ॥ १०० ॥
वैसे मैं आदि एक ही जान । उत्पन्न है मुझसे ही मन ।
मनसे सप्तऋषी उत्पन्न । तथा मनु भी ॥ १ ॥
उन्होंने किये लोकपाल निर्माण । लोक-पालोंने किया लोकसृजन ।
लोकोंसे हुई नाना प्रजा उत्पन्न । दीखती जो ॥ २ ॥
ऐसे इस विश्वका निर्माण । किया मैने ही पूर्ण रूपेण ।
चिंतन रतको होता ज्ञान । अन्यको नहीं ॥ ३ ॥
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥ ७ ॥
मेरा जो योग-विस्तार जानता यह तत्वता ।
वह निश्चय पायेगा इस निष्कंप योगको ॥ ७ ॥
३०७ विभूति-चिंतनयोग