ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
मेरे बिन कुछ भी नहीं । जिन्हें सुहाता कभी कहीं ।
उनके जीवन हेतु ही । एकमात्र मैं ॥ ३६ ॥
ऐसा अनन्य गति जो चित्त । मेरे ही चिंतनमें है रत ।
उनकी मैं हूँ दिन रात । सेवा करता ॥ ३७ ॥
जब वे एकनिष्ठ हो पार्थ । चलते रहते मेरा पथ ।
उनकी चिंता है मेरे साथ । लगती सदा ॥ ३८ ॥
फिर जो जो है उनको करना होता । वह सब मुझको ही करना पड़ता ।
जैसा अजात पक्षीका जीवन होता । पक्षिणीको जीना ॥ ३९ ॥
शिशु अपनी भूख-प्यास न जानता । तब माताको सब करना पड़ता ।
वैसे जो प्राण-पणसे मुझे भजता । उनकी सेवा लजाता नहीं ॥ ४० ॥
उसको चाह मेरे सायुज्यकी । उसे पूर्ण करना मेरे मनकी ।
या सेवाकी चाह मुझसे उसकी । जिससे होती प्रीति ॥ ४१ ॥
वैसे मनमें वे जो जो भाव । धरते पूर्ण करता देव ।
देता जो उसे मैं ही सदैव । रक्षण करता ॥ ४२ ॥
किंतु विश्वमें सकाम भक्त ही अधिक हैं—
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ २३ ॥
यह योग-क्षेम सम्पूर्ण । मुझ पर पडा अर्जुन ।
उसका है सर्व भावेन । मैं ही आश्रय ॥ ४३ ॥
अब अन्य कयी हैं संप्रदाय । जो मुझे न जानते मैं उन्हें नित्य ।
वे हैं अग्नि इन्द्र सूर्य सोमाय । कहकर हैं यजते ॥ ४४ ॥
वह भी है मेरा ही भजन । क्योंकि यह जो है मैं ही पूर्ण ।
किंतु यह सरल न जान । वक्र ही हैं ॥ ४५ ॥
श्रद्धा-पूर्वक जो कोयी पूजते अन्य दैवत ।
पूजते हैं मुझको ही किंतु है विधि छोडके ॥ २३ ॥
२७९ राज-विद्या समर्पणयोग
जैसे शाखा पल्लव वृक्षके । सारे हैं ये एक ही बीजके ।
किंतु पानी लेते हैं जडके । धर्म वैसे ही ॥ ४६ ॥
या जो दस इन्द्रियां हैं । सब एक ही देहकी हैं ।
इनके विषय जाते हैं । एक ही स्थानपे ॥ ४७ ॥
किंतु मृष्टान्न कैसे मधुर । कानोंमें भरना सुखकर ।
कैसे जाने सौरभ मधुर । सूँघकर नमक ॥ ४८ ॥
जैसे जिह्वासे रस चखना । घ्राणसे ही परिमल लेना ।
वैसे मेरा भजन करना । मुझे जानकर ॥ ४९ ॥
मुझे न जानकर भजन । करते हैं वह पार्थ जान ।
तभी कर्मके चक्षु हैं ज्ञान । वह हो निर्दोष ॥ ३५० ॥
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥२४॥
वैसे देखें तो हे पार्थ । यज्ञोपहार समस्त ।
मेरे बिन कहो भोक्ता । कौन है अन्य ॥ ५१ ॥
सकल यज्ञका मैं आदि । इसका मैं ही हूं अवधि ।
किंतु मुझे छोड दुर्बुद्धि । भजते देवोंको ॥ ५२ ॥
गंगाजीको गंगोदक ही जैसे । देते हैं देव पितरोद्देश्यसे ।
देते हैं मेरा ही मुझको वैसे । भावसे अन्य ॥ ५३ ॥
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपिमाम् ॥२५॥
इसीलिए सुन पांडुसुता । मुझे न मिलकर सर्वथा ।
दिया मनमें रख जो आस्था । वहीं गया ॥ ५४ ॥
भोक्ता मैं सब यज्ञोंका फलदायक भी स्वयं ।
न जाने तत्व जो मेरा गिरते हैं सदा वही ॥ २४ ॥
देवोंके भक्त देवोंसे पितृओंसे पितृ-पूजक ।
भूतोंके भक्त भूतोंसे मेरे जो मिलते मुझे ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी २८०
मन-वचन करणसे अर्जुन । करता है जो देवार्पण भजन ।
शरीर त्यागकर वह तत्क्षण । पाता देव-लोक ॥ ५५ ॥
अथवा पितरोंके व्रत । आचरता जिनका चित्त ।
समाप्त होतेही जिवित । पाते पितृ-लोक ॥ ५६ ॥
या क्षुद्र देवतादि जो भूत । जिनके हैं परम दैवत ।
अभिचारसे जिनका चित्त । करता उपासना ॥ ५७ ॥
उनका शरीर जब गिरता । भूतत्वको वह प्राप्त करता ।
संकल्पवशतासे है फळता । उनका कर्म ॥ ५८ ॥
मैं उनका हो जाता हूं जो मेरी निष्काम भक्ति करते हैं -
जिसने देखा मुझको ही आंखसे । जिसने सुना मुझको ही कानसे ।
मुझको ही प्रतीत किया मनसे । वाणीसे गाया ॥ ५९ ॥
अजी ! सर्वत्र सर्वांगसे । मुझे भजन पूजनसे ।
दान-पुण्य क्रिया भी उसे । मेरे ही हेतु ॥ ३६० ॥
जिन्होंने किया मेरा ही अध्ययन । अंदर बाहर मेरा ही चिंतन ।
मुझसे जुडा उनका जीवन । सर्व-भावसे ॥ ६१ ॥
धोते हैं वे सदैव अहंकार । हरि दास्यत्वका कर स्वीकार ।
उनका लोभ है एक आखर । केवल हरि-भक्ति ही ॥ ६२ ॥
जो मेरे ही काममें सकाम । मेरे ही प्रेममें सप्रेम ।
मेरे ही भ्रममें संभ्रम । जानता अन्य ॥ ६३ ॥
उनके शास्त्र मुझे ही जानते । उनके मंत्र मुझे ही जुडते ।
उनके तंत्र सदा ही करते । मेरा ही भजन ॥ ६४ ॥
आनेसे पहले वे मरण । ऐक्य हुए मुझसे अर्जुन ।
मर करके वे कौन स्थान । पाएंगे पार्थ ॥ ६५ ॥
इसीलिए जो मद्याजी हुए । मेरे ही सायुज्यमें वे आये ।
उपचारार्थ जिन्होंने दिये । अपने भाव ॥ ६६ ॥
२८१ राज-विद्या-समर्पणयोग
(36)
वैभव-पूर्ण पूजासे मैं किसीका नहीं होता — मुझे क्या कम है ? —
अजी ! आत्मार्पणके बिन । न भाता मुझे कुछ भिन्न ।
अन्य उपचारसे जान । मैं नहीं मिलता ॥ ६७ ॥
जाना कहता जो वह न जानता । संपन्नता दिखाना ही है न्यूनता ।
कृतार्थ हुआ मैं यह जो कहता । वह कुछ नहीं जान ॥ ६८ ॥
दान-यज्ञ-तपका जो अर्जुन । मनमें धरता है अभिमान ।
यहां यह सब तृण-समान । व्यर्थ जान तू ॥ ६९ ॥
जो है ज्ञानमें संपन्न । वेदसे बढ़के कौन ।
अचल शेष समान । कोयी है क्या ? ॥ ३७० ॥
शैयाके नीचे शेष छिपता । वेद नेति नेति है कहता ।
जहां ज्ञान भी है पगलाता । सनकादिकका ॥ ७१ ॥
तापसमें है कहां कौन । जो शूल-पाणीके समान ।
लेता है त्यज अभिमान । पद-जल सिरपे ॥ ७२ ॥
या ऐश्वर्यमें कौन । है लक्ष्मीके समान ।
है श्रियाके समान । घरमें दासी ॥ ७३ ॥
जिसके खेलका घरौंदा एक । कहलाता अमरावति नेक ।
तब हुए खिलौने इन्द्रादिक । उनके सब ॥ ३७४ ॥
जब वह तोड़ती अनचाह खेल । होते रंक इन्द्रादिक ले दल-बल ।
जिसके कटाक्षसे होते वृक्ष फल । सुरतरु दिव्य ॥ ७५ ॥
जिनकी दासियाँ विभिन्न । हैं इतनी शक्ति सम्पन्न ।
वह लक्ष्मी देवी महान । है यहाँ दासी ॥ ७६ ॥
करती वह सर्व भावसे सेवा । छोड़के अभिमान सब पांडव ।
तब कहीं चरण धोनेका दावा । पा सकी वह ॥ ७७ ॥
छोड़कर सब बड़प्पन । भूलकर व्युत्पत्ति सम्पूर्ण ।
होते हैं लघु अणु समान । पाते तब सामिप्य ॥ ७८ ॥
सहस्र करके समीप । चंद्रका भी होता है लोप ।
खद्योत करता प्रलाप । अपने प्रकाशका ॥ ७९ ॥
ज्ञानेश्वरी २८२
न चलती जहाँ लक्ष्मीकी महत्ता । तथा शिवका तप नहीं पुरता ।
घामड़ लोगोंका भला क्या चलता । वहाँ धनंजय ॥ ८० ॥
इसीलिए तन अर्पित कर । सकल गुण कर न्योछावर ।
संपत्ति-मद श्री-चरण पर । रख तत्पश्चात् ॥ ८१ ॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥
मुझे निष्काम प्रेम चाहिये-प्रेमसे दिया पत्ता भी मैं सुखसे खाता हूं—
कर निःसीम भाव उल्लास । मेरे अर्पणका ले उद्देश्य ।
जो भी फल दिया स-संतोष । लेता हूँ मैं ॥ ८२ ॥
जब वह भक्त मुझे दिखाता । अपने हाथ मैं दोनों बढ़ाता ।
उसका डंठल भी न तोड़ता । खाता हूँ आदरसे ॥ ८३ ॥
किसीने शुद्ध भक्तिसे । दिया सुमन प्रीतिसे ।
खाता भावातिरेकसे । भूल सूंघना ॥ ८४ ॥
फल-फूल क्यों इक पात । सूखा भी हो उसका गात ।
लेता उसे मोदसे पार्थ । देते हैं जो भक्तिसे ॥ ८५ ॥
देख भरा वह सर्व-भावसे । भूखा तोषता जैसे अमृतसे ।
वैसा मैं मुखमें तोषसे उसे । डालता हूँ पार्थ ॥ ८६ ॥
अथवा ऐसा भी जब होगा । वह पात भी नहीं मिलेगा ।
पानीका बूंद एक तो होगा । उसे नहीं अकाल ॥ ८७ ॥
वह है सर्वत्र रहता । सबको सहज मिलता ।
उसीका अर्पण करता । सर्वस्व मान ॥ ८८ ॥
उसने बैकुण्ठके विशाल । बनाया मेरे लिए महल ।
कौस्तुभसे भी अति निर्मल । दिये अलंकार ॥ ८९ ॥
प्रेमसे पत्र या पुष्प फल या जल दे मुझे
भक्तिसे जो दिया सारा खाता मैं सुख-पूर्वक ॥ २६ ॥
२८३ - राज-विद्या-समर्पणयोग
दूधके शैयागार । क्षीराब्धिसे सुन्दर ।
मेरे लिए अपार । दिये उसने ॥ ३९० ॥
कर्पूर चंदन अगरु । ऐसे सुगंध महामेरु ।
दी दीपमाल दिनकरु । उसने मुझे ॥ ९१ ॥
गरुड समान वाहन । सुरतरुके उपवन ।
काम धेनु बहु गोदान । उसने दिये ॥ ९२ ॥
अमृताम्भसे भी सरस । भक्तका जल-बिंदु लेश ।
लेकर पाता हूँ संतोष । धनंजय मैं ॥ ९३ ॥
कहना क्या है वह बात । जानता है तू यह पार्थ ।
सुदामाके चिउडेके हित । खोली गांठ ॥ ९४ ॥
केवल भक्ति ही मैं जानता । छोटा-मोटा वहां न कहता ।
भावका भूखा मैं रहता । अतिशय अर्जुन ॥ ९५ ॥
यहां है पत्र-पुष्प-फल-जल । भावार्पणका निमित्त केवल ।
आवश्यक है मुझको निष्कल । भक्ति तत्व सदैव ॥ ९६ ॥
इसलिए तू पांडुकुमार । अपनी बुद्धिको वशकर ।
अपने हृदयमें ही फिर । स्मरकर मुझको ॥ ९७ ॥
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ २७ ॥
जो सदैव मेरा स्मरण करता है वह सदैव मुक्त ही है—
जो कुछ तू व्यापार करता । अथवा जो कुछ है भोगता ।
तथा यज्ञमें तू जो यजता । नाना विधिसे ॥ ९८ ॥
अथवा विशेष पात्रको दान । या सेवकको तू देता वेतन ।
तथा व्रत-तप आदि साधन । करेगा तू ॥ ९९ ॥
खाता जो होमना देता जो जो आचरता तप ।
जो भी कुछ करें कर्म कर तू मुझ अर्पण ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी २८४
क्रिया-जात जो संपूर्ण । होगा तुझसे अर्जुन ।
करना तू यह मान । है सब मदर्थ ॥ ४०० ॥
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥
जैसे अग्निकुंडमें पड बीज । अंकुर दशा खोता है सहज ।
वैसे अर्पित शुभाशुभ मुझ । न फलते कभी ॥ १ ॥
अनर्पित कर्म जब रहता । सुख दुःखमें वह फलता ।
उसके भोगार्थ आना पडता । नया जन्म लेकर ॥ २ ॥
है जो मदर्पित कर्म । पोंछता मरण-जन्म ।
करे जन्म-सह श्रम । अन्य सब नष्ट ॥ ३ ॥
यह है संन्यस्तकी युक्ति । सरल होती फल-प्राप्ति ।
आचरणमें इसे अति । शीघ्र ही लाना ॥ ४ ॥
इससे देह-बंध नहीं घडता । सुख-दुखाब्दिका संबंध न आता ।
सुखका है सुखमें ही ऐक्य होता । सहज-रूपसे ॥ ५ ॥
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ २६ ॥
पूछेगा पार्थ तू वह कैसा । सर्व भूतमें सदा एकसा ।
जहां नहीं आप पर ऐसा । भेद-भाव ॥ ६ ॥
जो सदा सर्वत्र मुझे देखते हैं वे सदेह मुक्त हैं, मद्रूप हैं—
इस भांति मुझे जानकर । तोड कर्तृत्वका अहंकार ।
जीव-भावसे जो कर्मकर । भजते मुझको ॥ ७ ॥
जिससे तोडके सारे कर्म-बंध शुभाशुभ ।
साधके योग-संन्यास पायेगा मुक्त हो मुझे ॥ २८ ॥
सम मैं सब भूतोंसे प्रियाप्रिय न है मुझे ।
किंतु है मुझमें भक्त भक्तमें मैं बसा नित ॥ २९ ॥
२८५ राज-विद्या-समर्पणयोग
दीखते स्थित हैं देहमें । किंतु वे स्थिर हैं मुझमें ।
औ' मैं उनके हृदयमें । रहता संपूर्ण ॥ ८ ॥
संपूर्ण वटवृक्ष जैसे । बीजमें रहता है वैसे ।
तथा रहता बीज जैसे । वट-वृक्षमें ॥ ९ ॥
वैसे हमें और उन्हें परस्पर । बाहरको नामका ही है अंतर ।
किंतु अंतरमें जो वस्तु-विचार । हम हैं एक ॥ ४१० ॥
उधार लाये हुए अलंकार । चढाते हैं जैसे शरीर पर ।
वैसे धारण करता शरीर । उदास भावसे ॥ ११ ॥
परिमल ले गया जब पवन । डंडीमें रहता है तब सुमन ।
वैसे प्रारब्ध भोगके ही कारण । शरीर रहता है ॥ १२ ॥
अहंकार उनका संपूर्ण । हुआ है विलीन मद्भावन ।
मेरे ही अंदर है अर्जुन । स्थिर रूपसे वह ॥ १३ ॥
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥३०॥
प्रेम भावसे करता भजन । उसको फिर न मिलता तन ।
उसकी जातिकी नहीं अर्जुन । कोई बात ॥ १४ ॥
जो जिस क्षणसे भक्त बना उसी क्षणसे मेरा बना—
देखें तो उसका पूर्व जीवन । सब ही दुराचारोंकी है खान ।
किंतु उसने है अब जीवन । बेचा है भक्तिको ॥ १५ ॥
मरण समयमें जैसी है मति । रहती है जैसी, वैसी ही गति ।
मिलती है यह जानके भक्ति । की है सर्व भावसे ॥ १३ ॥
पहले था रत दुराचार । सर्वोत्तम है पांडुकुमार ।
महापूरमें है डूबकर । मरा नहीं ॥ १७ ॥
कोयी बडा दुराचारी भजे मुझ अनन्य हो ।
मानना उसको साधु उसको शुभ निश्चयी ॥ ३० ॥
ज्ञानेश्वरी २८६
जीवन उसका इस किनारे आया । इसलिए डूबा हुआ भी व्यर्थ गया
रहा ही ऐसा नहीं जो पाप किया । भक्तिके कारण ॥ १८ ॥
पहले था जो दुराचारी महान् । किंतु पश्चात्ताप तीर्थमें कर स्नान ।
मेरी शरणमें आया जो अर्जुन । सर्व भावसे ॥ १९ ॥
उसका है अब पवित्र कुल । अभिजात्य तथा अति निर्मल ।
जन्मका उसको मिला है फल । भक्तिके कारण ॥ ४२० ॥
उसने किया सब अध्ययन । तथा समस्त तप अनुष्ठान ।
अष्टांग-योग भी सुन अर्जुन । सिद्ध उसको ॥ २१ ॥
रहने दे अब यह पार्थ । जिसकी चाह है "मैं" सतत ।
कर्म-बंधनसे वह मुक्त । सर्वदा ही ॥ २२ ॥
मन-बुद्धि सब एक गांठमें । बांध कर दी वह पिटारीमें ।
वह पिटारी मेरे स्वरूपमें । रख दी धनंजय ॥ २३ ॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥
स-समय वह मद्रूप होगा । चितमें तेरे यह भाव होगा ।
सदैव जो अमृतमें रहेगा । मरेगा कैसे ॥ २४ ॥
तभी रात्री कहलाती है । सूर्य जब नहीं होता है ।
भद्भक्ति बिन जो होता है । वह सब पाप ॥ २५ ॥
इसलिए उसका चित । रहता मुझमें सतत ।
तभी होता वह निश्चित । मद्रूप तत्वतः ॥ २६ ॥
जैसे दीपसे दीप है जलता । वहां पहला कौन न जानता ।
वैसे सदैव जो मुझे भजता । होता वह मैं ही ॥ २७ ॥
फिर मेरी ही नित्य-शांति । उसकी दशा वही कांति ।
जीवित रहता स-भक्ति । मेरे ही जीवसे ॥ २८ ॥
होगा जो शीघ्र धर्मात्मा शांति शाश्वत पाकर ।
जान निश्चित तू मेरे भक्तका नाश है नहीं ॥ ३१ ॥
२८७ राज-विद्या-समर्पणयोग
केवल शास्त्रीय भक्तिसे मेरी प्राप्ति नहीं होती—
कहूँ कितना पुनः पुनः । वही वही फिर अर्जुन।
नहीं होगी भक्तिके बिन । मेरी प्राप्ति ॥ २९ ॥
व्यर्थ है कुल अभिमान । व्यर्थ शास्त्राध्ययनभान ।
व्यर्थ है श्रेष्ठताका मान । लोभ-मात्र ॥ ४३० ॥
व्यर्थ है रूप अभिमान । व्यर्थ है तारुण्य यौवन ।
एक मेरे भावके बिन । व्यर्थका बतंगड ॥ ३१ ॥
भुट्टे लगे बहु धान विहीन । बसे नगर, पर हैं वीरान ।
उसका है कहो क्या प्रयोजन । वैसे ही पार्थ ॥ ३२ ॥
सरोवर बड़ा नीर विहीन । तथा दुखीसे दुखिका मिलन ।
बांझ लताका बहार सुमन । खिला वैसा ॥ ३३ ॥
वैसा मानो सकल वैभव । अथवा कुल-जाति-गौरव ।
वैसा ही देह स-अवयव । किंतु नहीं प्राण ॥ ३४ ॥
वैसी मेरी भक्ति बिन । व्यर्थ है सारा जीवन ।
अजी ! पृथ्विपे पाषाण । रहते वैसे ॥ ३५ ॥
हिंवारेका आच्छादन घन । त्यज देते हैं जैसे सज्जन ।
पुण्य करता अवहेलन । वैसे अभक्तको ॥ ३६ ॥
नीममें निंबौरिका बहार आया । जिससे कौवोंका ही सुकाल भया ।
वैसे भक्ति-हीनको ऐश्वर्य आया । दोष बढानेको ॥ ३७ ॥
परोसा खप्परमें षड्रसान्न । रखा चौराहे पर अपरान्ह ।
खायेगा उसको केवल श्वान । वैसे ही पार्थ ॥ ३८ ॥
वैसे भक्ति-हीनका जीवन । स्वप्नमें भी सुकृति-विहीन ।
संसार दुःखका आव्हान । केवल-मात्र ॥ ३९ ॥
व्यर्थ है कुलकी उत्तमता । अन्त्यजका भी तन मिलता ।
पशुका शरीर भी मिलता । शरीरके नामसे ॥ ४४० ॥
पकड़ा मगरने गजेन्द्रको । उसने स्मरण किया मुझको ।
व्यर्थ किया अपनी पशुताको । पाकर मद्रूप ॥ ४१ ॥
ज्ञानेश्वरी २८८
मेरी भक्ति में कुल जाति आदिका बंधन नहीं—मुझे प्रेम चाहिये—
आती लेनेमें लज्जा नाम । जो अधमोंमें अधमतम ।
ऐसी योनिमें जिन्होंने जन्म । लिया है अर्जुन ॥ ४२ ॥
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथाशूद्रास्तेऽपि यांति परां गतिम् ॥ ३२ ॥
जो हैं पापयोनिके मूढ । जैसे पत्थर सम जड ।
किंतु है मुझमें वे दृढ । सर्व भावसे ॥ ४३ ॥
वाणीमें जिनके मेरे आलाप । नयन भोगते मेरे ही रूप ।
मनमें सतत मेरा संकल्प । भरे रहते हैं ॥ ४४ ॥
मेरी कीर्ति-कथाके बिन । न करते अन्य श्रवण ।
जिनके सर्वांग-भूषण । मेरी सेवा ॥ ४५ ॥
ज्ञानका विषय वे न जानते । केवल मुझ एकको जानते ।
उन्हें ऐसा लाभ मिला तो जीते । नहीं तो मरण ॥ ४६ ॥
ऐसा हुआ जो सम्पूर्ण । सर्व-भाव कर अर्पण ।
जीवनका बना जीवन । मैं ही एक ॥ ४७ ॥
पाप योनिमें हुआ जनन । सुनके भी न हुआ पठन ।
तुलनामें उनका वज़न । मुझसे कम नहीं ॥ ४८ ॥
भक्ति संपन्नताके कारण । देव बने राक्षसोंसे हीन ।
मेरा नरसिंहका भूषण । उसकी महिमा ॥ ४९ ॥
किया प्रह्लादका अंगीकार । मेरे स्थानमें पांडुकुमार ।
प्रह्लाद कथामें साक्षात्कार । होता मेरा ही ॥ ४५० ॥
उसका है दैत्य-कुल आखर । इंद्रको नहीं वह अधिकार ।
यहां है भक्ति महिमा अपार । कुल-जातिकी नहीं ॥ ५१ ॥
करके आसरा मेरा भोले स्त्री-वैश्य-शूद्र भी ।
या पाप-योनिके जीव पाते हैं सुख शाश्वत ॥ ३२ ॥
(37) २८९ राज-विद्या-समर्पणयोग
राजाज्ञाके होते चार अक्षर । वह भी चामके टुकडे पर ।
वह टुकडा देता है अपार । वस्तु-मात्र ॥ ५२ ॥
आज्ञाके उन अक्षरके बिन । स्वर्ण-रजत भी प्रमाण-हीन ।
उस अक्षर चामके कारण । मिलते सर्व वस्तु ॥ ५३ ॥
उत्तमता तो तभी है । यथा सर्वज्ञता भी है ।
मन बुद्धि भारता है । जब मेरे प्रेमसे ॥ ५४ ॥
इसलिए कुल जाति वर्ण । ये सब ही हैं बिना कारण ।
मुझमें हैं अनन्य शरण । सार्थक एक ॥ ५५ ॥
मुझमें मिलनेके बाद कोयी भिन्नता नहीं रहती—
जब किसी न किसी कारण । मन होता मद्रूपमें लीन ।
तब होता है पुर्णरूपेण । जाति कुलादि व्यर्थ ॥ ५३ ॥
तब तक नाले कहलाते । गंगामें जब नहीं मिलते ।
फिर मात्र गंगाजल होते । गंगारूप हो ॥ ५७ ॥
जैसे खदिर चंदनादि काष्ठ । तब तक भिन्न रहते स्पष्ट ।
यज्ञाहुति देने पर है नष्ट । भिन्नता सारी ॥ ५८ ॥
वैसे हैं क्षत्रिय वैश्य स्त्रियां । शूद्र अन्त्यजादि कहलाया ।
मुझमें विलय न हो गया । तब तक ही सब ॥ ५९ ॥
जाति कुल व्यक्ति फिर बनता शून्य । होता है जब चित्त मुझमें अनन्य ।
घुलते जैसे लवण कण सामान्य । सागरमें वैसे ॥ ४६० ॥
तब तक नदी नदोंका नाम रहता । वैसे ही पूर्व पश्चिम प्रवाह रहता ।
किंतु जब सागरमें मिल जाता । सब होता एकरूप ॥ ६१ ॥
लेकर कोयी न कोयी निमित्त । होता लय जब मुझमें चित्त ।
फिर होता है उसमें निश्चित । मद्रूप ऐसे ॥ ६२॥
अव्यभिचारी शत्रुतासे भी मेरी प्राप्ति होती है —
तोडने हेतु पडा पारस पर । लोहेका घन उसे स्पर्श कर ।
होगा निश्चित ही सुवर्ण सत्वर । सहज-भावसे ॥ ६३ ॥
ज्ञानेश्वरी २९०
वृजांगनाएं प्रेमवश होकर । मनमें स्मरण कर निरन्तर ।
पार्थ वे सब मुझसे मिलकर । मद्रूप हो गयीं ॥ ३४ ॥
वैसे ही भयके करण । निशिदिन कर चिंतन ।
अखंड बैर धर मन । कंस चेद्यादि ॥ ६५ ॥
ममत्वसे भी भक्त मुझे मिलते हैं—
आप्तत्वसे हैं पांडव । संगसे सब यादव ।
ममत्वसे वसुदेव । तथा अन्य भी सब ॥ ६६ ॥
नारद ध्रुव अक्रूर । शुक और सनत्कुमार ।
भक्तिसे मैं धनुर्धर । हुवा प्राप्त ॥ ६७ ॥
वृजांगनाओंको कामसे । कंसको भय संभ्रमसे ।
धातुक मनके धर्मसे । शिशुपालादिकको ॥ ६८ ॥
सब पंथोंका एक स्थान । होना है मुझमें विलीन ।
सभक्ति विषय भंजन । या विराग वैसे ॥ ६९ ॥
इसलिए हे अर्जुन । होने मुझमें विलीन ।
उपायोंका जो बंधन । नहीं है कोई ॥ ४७० ॥
तथा किसी कुलमें होना जनन । करें प्रेम-वैर अथवा भजन ।
किंतु भक्त या शत्रु होना अर्जुन । एकमात्र मेरा ही ॥ ७१ ॥
किसी रूपमें सतत । होना है मुझमें रत ।
मद्रूप होना निश्चित । स्वाभाविक ॥ ७२ ॥
वैसे ही पाप योनी भी अर्जुन । क्षत्रिय वैश्य शूद्र औ' अंगना ।
भजकर मुझे मेरे सदन । पायेंगे ही ॥ ७३ ॥
वर्णमें हैं जो छत्र चामर । स्वर्ग है जिनका अग्रहार ।
मंत्र है जिनका मातृघर । वे हैं ब्राह्मण ॥ ७४ ॥
बसता जहाँ अखंड याग । तथा हैं जो वेदोंका वस्त्रांग ।
जिनकी दृष्टिका है उत्संग । बढाता मांगल्य ॥ ७५ ॥
जो हैं पृथ्वी तलके देव । तपावतार जो सवयव ।
सकल तीर्थोंका जो है दैव । उदित हुआ है ॥ ७६ ॥
२९१ राज-विद्या-समर्पणयोग
जिनकी आस्था है शीतल । बढाती सत्कर्मकी वेल ।
सत्य है जीवित केवल । उनके संकल्पसे ॥ ७७ ॥
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥
सबके लिए मेरा द्वार खुला है—
आशिर्वादसे उनके । बने आयुष्य अग्निके ।
दिया सिंधुने उनके । प्रेमसे नीर ॥ ७८ ॥
मैंने किया लक्ष्मीको कुछ दूर । लिया हाथ कौस्तुभ उठाकर ।
बढाया हृदय आगेकी ओर । चरण रजके लिए ॥ ७९ ॥
अब तक वह पद मुद्रा । हृदयपे धरी है सु-भद्र ।
अपने ही ऐश्वर्य समुद्र । रक्षा हेतु ॥ ४८० ॥
जिनका क्रोध है अर्जुन । कालाग्निका वसतिस्थान ।
उनका प्रसाद महान । देता सर्व-सिद्धि ॥ ८१ ॥
ऐसे पुण्य-पूज्य जो ब्राह्मण । मुझमें होते अति निपुण ।
होके नित मत्परायण । यह क्या कहना ? ॥ ८२ ॥
चंदन-वृक्षके समीप होनेसे । तथा उनके पवनके स्पर्शसे ।
निर्जीव नीम भी हुआ योग्यतासे । चढा प्रभु मस्तक पर ॥ ८३ ॥
फिर चंदन वहां न पहुंचेगा । इस बातको मन कैसे मानेगा ।
अथवा चंदन वहां पहुंचेगा । यह कहना पडे क्यों ? ॥ ८४ ॥
शीतलताकी अपेक्षा कर । महादेवने मस्तक पर ।
धारण किया जो निरंतर । अर्ध चन्द्र ही ॥ ८५ ॥
जहां शीतलतामें अप्रतिम । सुवासमें चंद्रसे भी उत्तम ।
ऐसा चंदन क्यों न सर्वोत्तम । लगायें सर्वांगपे ॥ ८६ ॥
वहां ब्रह्मर्षि राजर्षि इनकी बात क्या रही ।
भज तू मुझ आया है दुखी नश्वर लोकमें ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी २९२
रथ्योदक हो जहां गंगा-शरण । करते हैं सागरोदक वरण ।
वहां जान्हवीकी समरस पूर्ण । अन्य गति कैसी ॥ ८७ ॥
इसलिए राजऋषि हो या ब्राह्मण । उनकी गति मति मैं ही हूँ शरण ।
उनका त्रिशुद्धि पूर्वक है निर्वाण । स्थिति-गति मैं हूँ ॥ ८८ ॥
जीर्ण आयुष्य नौकामें बैठकर मूर्खता--
बैठकरके शत-जर्जर नावमें । होता कैसे कहो निश्चित मनमें ।
या विवश हो जीना कैसे रणमें । शत संवत्सर ॥ ८९ ॥
पडता जहाँ पाषाण शरीर पर । न रखें ढाल कहो बीचमें क्योंकर ।
रहे कैसे उदास हो रोग-जर्जर । शरीर औषधसे ॥ ४९० ॥
भड़की जहां चहूं ओर आग । न जाय कैसे बचाकर भाग ।
कष्टमें नित न हो सानुराग । मुझे न भजे कैसे ॥ ९१ ॥
नहीं लगे मेरे भजनमें । ऐसा क्या सामर्थ्य है जनमें ।
विश्वास घरमें या भोगमें । है उनके ॥ ९२ ॥
या विद्याका या आयुका । ऐसा कौनसा प्राणियोंका ।
है मुझे न भजनेका । कहो सुखाधार ॥ ९३ ॥
मिलता है जितना भोग्य-जात । वह है केवल शरीर हित ।
ओ' शरीर रहता है सतत । मृत्युके मुखमें ॥ ९४ ॥
अजी ! दुःखका माल आयात होता । हाठमें मृत्युके तौलसे तुलता ।
उस मृत्युलोकमें आना पडता । अन्तिम हाठमें ॥ ९५ ॥
अब सुखका जीवित । कैसे मिले पांडुसुत ।
फूंककर राख जोत । जलेगी कैसे ॥ ९६ ॥
अजी ! विषकंद पीसकर । उसका रस निचोडकर ।
उसे नाम अमृत देकर । अमर हो कैसे ॥ ९७ ॥
ऐसे हैं विषयोंका सुख । केवल है परम दुःख ।
सेवन करते हैं मूर्ख । जीव भावसे ॥ ९८ ॥
२९३ राज-विद्या-समर्पणयोग
अथवा काटकर अपना शिर । करना पैर तलके उपचार ।
ऐसा है मृत्यु लोकका व्यवहार । भला है सतत ॥ ९९ ॥
मृत्युलोकमें कहानी सुखकी । श्रवण करना सभी व्यथाकी ।
जहाँ शैया ही अग्नि-स्फुलिंगकी । सुख-निद्रा कैसी ॥ ५०० ॥
क्षयरोगी होता चन्द्र जिस लोकका । अस्तार्थ उदय होता रवि जहांका
दुःख आता है आवरणमें सुखका । छलनेके लिए ही ॥ १ ॥
जहां फूटते ही मांगल्यका अंकुर । पडते अमंगल कीट उसपर ।
पडता जहां मृत्यु पाश भयंकर । गर्भमें ही ॥ २ ॥
मिलना नहीं जो उसका चिंतन । मिले तो करते गंधर्व हरण ।
जाता उसका न होता आकलन । कहां और कैसे ॥ ३ ॥
अजी ! खोल जब सब ही पथ । लौटा पदचिह्न न देख पार्थ ।
मिलता सब मृतकोंका कथित । पुराणोंमें जहाँ ॥ ४ ॥
यहाँकी अनित्यताकी महती । ब्रह्मकी आयुतक पहुँचती ।
नश्वरताकी है कितनी व्याप्ति । स्वस्थ चित्त सुन तू ॥ ५ ॥
सुन ऐसे लोगोंका बर्ताव । जबसे जन्म लिये ये जीव ।
उनकी निश्चिंतता वैभव । कौतुकास्पद ॥ ६ ॥
जहां होता इह परका लाभ । वहां धरते कवडीका लोभ ।
तथा होता जहां विनाश सब । खरचते हैं करोडों ॥ ७ ॥
उलझता जो विषय भोगमें । सुखी कहलाता इस लोकमें ।
गडा जाता है जो महा-लोभमें । वह है महा-ज्ञानी ॥ ८ ॥
जिसका रहा अल्प जीवन । हुआ सब बल-बुद्धि जीर्ण ।
उसके पकडते चरण । वृद्ध कहकर ॥ ९ ॥
जैसा होता बालकका विकास । माता-पिता नाचते स-उल्लास ।
अंदरसे होता जीवन ह्रास । इसका नहीं खेद ॥ ५१० ॥
जो जन्मके दिवस दिवस-से । चलता मृत्यु दिशामें गतिसे ।
करते शुभोत्सव उल्लाससे । वृद्धि-दिवस मानकर ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी २९४
अजी ! मृत्यु यह शब्द न सहते । मरने पर जो रुदन करते ।
तथा आयुष्य व्यर्थ ही खोते । मूर्खताओंमें ॥ १२ ॥
निगलता है सांप मेंढकको । मेंढक जीभ चाटता है कीटकको ।
औ' प्राणि किस लोभसे किसको । बढाता तृष्णा ॥ १३ ॥
अजी ! यह है सब अनिष्ट । मृत्यु लोकका सब उलट ।
यहां अर्जुन तू अवघट । जन्म लिया है ॥ १४ ॥
तू इससे दूर रह कर मेरी भक्ति कर -
तू हो दूर इससे अलग । मेरी भक्तिके पथमें लग ।
पायेगा तू जिससे अव्यंग । निजधाम मेरा ॥ १५ ॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ३४ ॥
मनको तू मद्रूप कर । मेरी भक्तिमें डूब कर ।
सर्वत्र कर नमस्कार । एक मुझको ॥ १६ ॥
मेरी भक्ति करनेका अर्थ सब कुछ मुझे समर्पण करना -
कर तू सतत मेरा अनुसंधान । उससे होगा संकल्प-बीज दहन ।
इसको कहते हैं भगवद्भजन । पांडुकुमार ॥ १७ ॥
होगा तू इससे मम-योग संपन्न । तब रहेगा मेरे स्वरूपमें लीन ।
यह मेरे अंतःकरणका वचन । कहा तुमसे ॥ १८ ॥
सबसे छिपाई बात । हुई अब तुझे प्राप्त ।
उससे हो तू सुखी शाश्वत । सदैव रहेगा ॥ १९ ॥
ऐसा श्याम-परब्रह्म । भक्त-वत्सल कल्पद्रुम ।
बोला है जो आत्माराम । कहता संजय ॥ ५२० ॥
प्रेमसे ध्यानसे नित्य भज तू पूज तू मुझे ।
ऐसे ही मिल आत्मामें मुझमें लीन होकर ॥ ३४ ॥
२९५ राज-विद्या-समर्पणयोग
कृष्णकी बात धृतराष्ट्रसे कहते समय संजयकी मनस्थिति—
अजी ! श्रवण किया क्या अपने। पूछा जब राजासे संजयने ।
मौन होके सुन लिया बूढेने । पानीमें पडे भैसेकासा ॥ २१ ॥
तब डुला संजय सहसा । मानो आज अमृत बरसा ।
किंतु होकर भी न होनासा । रहा यह बूढा ॥ २२ ॥
फिर भी यह हमारा दातार । मानके रहा स्वस्थ-स-आदर ।
इनका स्वभाव है मानकर । संजय मनमें ॥ २३ ॥
करके श्रीमुनि-व्यासने निमित्त । राजको सुनाना युद्धका वृत्तांत ।
किया मानो मेरा उद्धार निश्चित । हर्षाया संजय ॥ २४ ॥
दृढ कर अपना सायास । बोला वह इतना मानस ।
पुलक हो आये स-उल्लास । अष्ट-सिद्धि-भाव ॥ २५ ॥
भक्तिके अष्ट सिद्धि भाव—
चकित हो भर आया है चित्त । लूली पडी वाचा हो प्रमुदित ।
आपाद मस्तक है कंचुकित । हुआ रोमांचसे ॥ २६ ॥
भये अर्धोन्मिलित नयन । वरस पडे आनंद घन ।
हुआ सकंप सारा बदन । अंतर्मुख भावसे ॥ २७ ॥
अजी ! संपूर्ण रोममूल । खिले स्वेदकण निर्मल ।
जैसे मोतिकी मणिमाल । बनी कंचुकिसी ॥ २८ ॥
महा सुखके अति-रससे ऐसा । मिटने लगी जैसी जीवदशा ।
वहां श्री व्यासाज्ञाका भान कैसा । रहेगा भला ॥ २९ ॥
इतनेमें कृष्णार्जुनके वचन । गूंजने लगे श्रवणोंमें महान ।
लौटा लाया वह शरीरका भान । संजयका तब ॥ ५३० ॥
ध्यान देनसे आनंद-सिंहासन पर चढते ?—
पोंछा तब नयन जल । तथा स्वेद बिंदु निर्मल ।
मुखसे निकले ये बोल । श्रीमान् सुनिये जी ॥ ६१ ॥
ज्ञानेश्वरी २९६
पड़ेगे अब कृष्णार्जुन वाक्य बीज । सात्विक भाव-युत चित्तमें सहज ।
खिलेगा प्रेम-प्रमेयका बाग आज । श्रोताओंके लिए ॥ ३२ ॥
अजी ! देना अब अवधान । चढना आनंद सिंहासन ।
देवने डाली माला श्रवण- । इंद्रियको आज ॥ ३३ ॥
विभूतियोंका अब महाज्ञान । देगा अर्जुनको सिद्ध श्रीकृष्ण ।
सुनिये ज्ञानदेवका कथन । जो है निवृत्तिका दास ॥ ३४ ॥
गीता श्लोक ३४
ज्ञानेश्वरी ओवी ५३४-
ॐ
(38)
१०
विभूति-चिंतनयोग
श्री गुरु निवृत्तिनाथका आध्यात्मिक स्वरूप
विश्वबोधविदग्ध । विद्यारविंद-प्रबोध ।
पराप्रमेय-प्रमद- । विलासिया नमो ॥ १ ॥
संसारतमका तू सूर्य । अप्रतिम परम-वीर्य ।
नमो तरुण-तर-तूर्य । लालनलीला ॥ २ ॥
जगदखिल-पालन । मंगलमणि-निधान ।
स्वजन-वन-चंदन । नमो आराध्यलिंग ॥ ३ ॥
चतुर-चित-चकोरचंद्र । आत्मानुभव-महानरेंद्र ।
श्रुतिगुणगण तू समुद्र । मन्मथ मन्मथ नमो ॥ ४ ॥
सुभाव-भजन-भाजन । तू भवेभ-कुंभ-भंजन ।
विश्व-उद्भवका भवन । नमो श्री गुरुदेव ॥ ५ ॥
श्री गुरुका सामर्थ्य—
तेरा अनुग्रह श्री गणेश । देता है जो अपना स्वरस ।
तब सरस्वतीमें प्रवेश । होता है शिशुका ॥ ६ ॥
आश्वासन उदार देयका । जलाता दीप नव-रसका ।
थाह लगाता तब वाणीका । अनायास ॥ ७ ॥