ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन चलती जहाँ लक्ष्मीकी महत्ता । तथा शिवका तप नहीं पुरता ।
घामड़ लोगोंका भला क्या चलता । वहाँ धनंजय ॥ ८० ॥
इसीलिए तन अर्पित कर । सकल गुण कर न्योछावर ।
संपत्ति-मद श्री-चरण पर । रख तत्पश्चात् ॥ ८१ ॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥
मुझे निष्काम प्रेम चाहिये-प्रेमसे दिया पत्ता भी मैं सुखसे खाता हूं—
कर निःसीम भाव उल्लास । मेरे अर्पणका ले उद्देश्य ।
जो भी फल दिया स-संतोष । लेता हूँ मैं ॥ ८२ ॥
जब वह भक्त मुझे दिखाता । अपने हाथ मैं दोनों बढ़ाता ।
उसका डंठल भी न तोड़ता । खाता हूँ आदरसे ॥ ८३ ॥
किसीने शुद्ध भक्तिसे । दिया सुमन प्रीतिसे ।
खाता भावातिरेकसे । भूल सूंघना ॥ ८४ ॥
फल-फूल क्यों इक पात । सूखा भी हो उसका गात ।
लेता उसे मोदसे पार्थ । देते हैं जो भक्तिसे ॥ ८५ ॥
देख भरा वह सर्व-भावसे । भूखा तोषता जैसे अमृतसे ।
वैसा मैं मुखमें तोषसे उसे । डालता हूँ पार्थ ॥ ८६ ॥
अथवा ऐसा भी जब होगा । वह पात भी नहीं मिलेगा ।
पानीका बूंद एक तो होगा । उसे नहीं अकाल ॥ ८७ ॥
वह है सर्वत्र रहता । सबको सहज मिलता ।
उसीका अर्पण करता । सर्वस्व मान ॥ ८८ ॥
उसने बैकुण्ठके विशाल । बनाया मेरे लिए महल ।
कौस्तुभसे भी अति निर्मल । दिये अलंकार ॥ ८९ ॥
प्रेमसे पत्र या पुष्प फल या जल दे मुझे
भक्तिसे जो दिया सारा खाता मैं सुख-पूर्वक ॥ २६ ॥
२८३ - राज-विद्या-समर्पणयोग