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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 364

अथवा काटकर अपना शिर । करना पैर तलके उपचार ।
ऐसा है मृत्यु लोकका व्यवहार । भला है सतत ॥ ९९ ॥
मृत्युलोकमें कहानी सुखकी । श्रवण करना सभी व्यथाकी ।
जहाँ शैया ही अग्नि-स्फुलिंगकी । सुख-निद्रा कैसी ॥ ५०० ॥
क्षयरोगी होता चन्द्र जिस लोकका । अस्तार्थ उदय होता रवि जहांका
दुःख आता है आवरणमें सुखका । छलनेके लिए ही ॥ १ ॥
जहां फूटते ही मांगल्यका अंकुर । पडते अमंगल कीट उसपर ।
पडता जहां मृत्यु पाश भयंकर । गर्भमें ही ॥ २ ॥
मिलना नहीं जो उसका चिंतन । मिले तो करते गंधर्व हरण ।
जाता उसका न होता आकलन । कहां और कैसे ॥ ३ ॥
अजी ! खोल जब सब ही पथ । लौटा पदचिह्न न देख पार्थ ।
मिलता सब मृतकोंका कथित । पुराणोंमें जहाँ ॥ ४ ॥
यहाँकी अनित्यताकी महती । ब्रह्मकी आयुतक पहुँचती ।
नश्वरताकी है कितनी व्याप्ति । स्वस्थ चित्त सुन तू ॥ ५ ॥
सुन ऐसे लोगोंका बर्ताव । जबसे जन्म लिये ये जीव ।
उनकी निश्चिंतता वैभव । कौतुकास्पद ॥ ६ ॥
जहां होता इह परका लाभ । वहां धरते कवडीका लोभ ।
तथा होता जहां विनाश सब । खरचते हैं करोडों ॥ ७ ॥
उलझता जो विषय भोगमें । सुखी कहलाता इस लोकमें ।
गडा जाता है जो महा-लोभमें । वह है महा-ज्ञानी ॥ ८ ॥
जिसका रहा अल्प जीवन । हुआ सब बल-बुद्धि जीर्ण ।
उसके पकडते चरण । वृद्ध कहकर ॥ ९ ॥
जैसा होता बालकका विकास । माता-पिता नाचते स-उल्लास ।
अंदरसे होता जीवन ह्रास । इसका नहीं खेद ॥ ५१० ॥
जो जन्मके दिवस दिवस-से । चलता मृत्यु दिशामें गतिसे ।
करते शुभोत्सव उल्लाससे । वृद्धि-दिवस मानकर ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी २९४