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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 349

मेरे बिन कुछ भी नहीं । जिन्हें सुहाता कभी कहीं ।
उनके जीवन हेतु ही । एकमात्र मैं ॥ ३६ ॥
ऐसा अनन्य गति जो चित्त । मेरे ही चिंतनमें है रत ।
उनकी मैं हूँ दिन रात । सेवा करता ॥ ३७ ॥
जब वे एकनिष्ठ हो पार्थ । चलते रहते मेरा पथ ।
उनकी चिंता है मेरे साथ । लगती सदा ॥ ३८ ॥
फिर जो जो है उनको करना होता । वह सब मुझको ही करना पड़ता ।
जैसा अजात पक्षीका जीवन होता । पक्षिणीको जीना ॥ ३९ ॥
शिशु अपनी भूख-प्यास न जानता । तब माताको सब करना पड़ता ।
वैसे जो प्राण-पणसे मुझे भजता । उनकी सेवा लजाता नहीं ॥ ४० ॥
उसको चाह मेरे सायुज्यकी । उसे पूर्ण करना मेरे मनकी ।
या सेवाकी चाह मुझसे उसकी । जिससे होती प्रीति ॥ ४१ ॥
वैसे मनमें वे जो जो भाव । धरते पूर्ण करता देव ।
देता जो उसे मैं ही सदैव । रक्षण करता ॥ ४२ ॥
किंतु विश्वमें सकाम भक्त ही अधिक हैं—
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ २३ ॥
यह योग-क्षेम सम्पूर्ण । मुझ पर पडा अर्जुन ।
उसका है सर्व भावेन । मैं ही आश्रय ॥ ४३ ॥
अब अन्य कयी हैं संप्रदाय । जो मुझे न जानते मैं उन्हें नित्य ।
वे हैं अग्नि इन्द्र सूर्य सोमाय । कहकर हैं यजते ॥ ४४ ॥
वह भी है मेरा ही भजन । क्योंकि यह जो है मैं ही पूर्ण ।
किंतु यह सरल न जान । वक्र ही हैं ॥ ४५ ॥
श्रद्धा-पूर्वक जो कोयी पूजते अन्य दैवत ।
पूजते हैं मुझको ही किंतु है विधि छोडके ॥ २३ ॥
२७९ राज-विद्या समर्पणयोग