ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूधके शैयागार । क्षीराब्धिसे सुन्दर ।
मेरे लिए अपार । दिये उसने ॥ ३९० ॥
कर्पूर चंदन अगरु । ऐसे सुगंध महामेरु ।
दी दीपमाल दिनकरु । उसने मुझे ॥ ९१ ॥
गरुड समान वाहन । सुरतरुके उपवन ।
काम धेनु बहु गोदान । उसने दिये ॥ ९२ ॥
अमृताम्भसे भी सरस । भक्तका जल-बिंदु लेश ।
लेकर पाता हूँ संतोष । धनंजय मैं ॥ ९३ ॥
कहना क्या है वह बात । जानता है तू यह पार्थ ।
सुदामाके चिउडेके हित । खोली गांठ ॥ ९४ ॥
केवल भक्ति ही मैं जानता । छोटा-मोटा वहां न कहता ।
भावका भूखा मैं रहता । अतिशय अर्जुन ॥ ९५ ॥
यहां है पत्र-पुष्प-फल-जल । भावार्पणका निमित्त केवल ।
आवश्यक है मुझको निष्कल । भक्ति तत्व सदैव ॥ ९६ ॥
इसलिए तू पांडुकुमार । अपनी बुद्धिको वशकर ।
अपने हृदयमें ही फिर । स्मरकर मुझको ॥ ९७ ॥
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ २७ ॥
जो सदैव मेरा स्मरण करता है वह सदैव मुक्त ही है—
जो कुछ तू व्यापार करता । अथवा जो कुछ है भोगता ।
तथा यज्ञमें तू जो यजता । नाना विधिसे ॥ ९८ ॥
अथवा विशेष पात्रको दान । या सेवकको तू देता वेतन ।
तथा व्रत-तप आदि साधन । करेगा तू ॥ ९९ ॥
खाता जो होमना देता जो जो आचरता तप ।
जो भी कुछ करें कर्म कर तू मुझ अर्पण ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी २८४