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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 363

रथ्योदक हो जहां गंगा-शरण । करते हैं सागरोदक वरण ।
वहां जान्हवीकी समरस पूर्ण । अन्य गति कैसी ॥ ८७ ॥
इसलिए राजऋषि हो या ब्राह्मण । उनकी गति मति मैं ही हूँ शरण ।
उनका त्रिशुद्धि पूर्वक है निर्वाण । स्थिति-गति मैं हूँ ॥ ८८ ॥
जीर्ण आयुष्य नौकामें बैठकर मूर्खता--
बैठकरके शत-जर्जर नावमें । होता कैसे कहो निश्चित मनमें ।
या विवश हो जीना कैसे रणमें । शत संवत्सर ॥ ८९ ॥
पडता जहाँ पाषाण शरीर पर । न रखें ढाल कहो बीचमें क्योंकर ।
रहे कैसे उदास हो रोग-जर्जर । शरीर औषधसे ॥ ४९० ॥
भड़की जहां चहूं ओर आग । न जाय कैसे बचाकर भाग ।
कष्टमें नित न हो सानुराग । मुझे न भजे कैसे ॥ ९१ ॥
नहीं लगे मेरे भजनमें । ऐसा क्या सामर्थ्य है जनमें ।
विश्वास घरमें या भोगमें । है उनके ॥ ९२ ॥
या विद्याका या आयुका । ऐसा कौनसा प्राणियोंका ।
है मुझे न भजनेका । कहो सुखाधार ॥ ९३ ॥
मिलता है जितना भोग्य-जात । वह है केवल शरीर हित ।
ओ' शरीर रहता है सतत । मृत्युके मुखमें ॥ ९४ ॥
अजी ! दुःखका माल आयात होता । हाठमें मृत्युके तौलसे तुलता ।
उस मृत्युलोकमें आना पडता । अन्तिम हाठमें ॥ ९५ ॥
अब सुखका जीवित । कैसे मिले पांडुसुत ।
फूंककर राख जोत । जलेगी कैसे ॥ ९६ ॥
अजी ! विषकंद पीसकर । उसका रस निचोडकर ।
उसे नाम अमृत देकर । अमर हो कैसे ॥ ९७ ॥
ऐसे हैं विषयोंका सुख । केवल है परम दुःख ।
सेवन करते हैं मूर्ख । जीव भावसे ॥ ९८ ॥
२९३ राज-विद्या-समर्पणयोग