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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 366

कृष्णकी बात धृतराष्ट्रसे कहते समय संजयकी मनस्थिति—
अजी ! श्रवण किया क्या अपने। पूछा जब राजासे संजयने ।
मौन होके सुन लिया बूढेने । पानीमें पडे भैसेकासा ॥ २१ ॥
तब डुला संजय सहसा । मानो आज अमृत बरसा ।
किंतु होकर भी न होनासा । रहा यह बूढा ॥ २२ ॥
फिर भी यह हमारा दातार । मानके रहा स्वस्थ-स-आदर ।
इनका स्वभाव है मानकर । संजय मनमें ॥ २३ ॥
करके श्रीमुनि-व्यासने निमित्त । राजको सुनाना युद्धका वृत्तांत ।
किया मानो मेरा उद्धार निश्चित । हर्षाया संजय ॥ २४ ॥
दृढ कर अपना सायास । बोला वह इतना मानस ।
पुलक हो आये स-उल्लास । अष्ट-सिद्धि-भाव ॥ २५ ॥
भक्तिके अष्ट सिद्धि भाव—
चकित हो भर आया है चित्त । लूली पडी वाचा हो प्रमुदित ।
आपाद मस्तक है कंचुकित । हुआ रोमांचसे ॥ २६ ॥
भये अर्धोन्मिलित नयन । वरस पडे आनंद घन ।
हुआ सकंप सारा बदन । अंतर्मुख भावसे ॥ २७ ॥
अजी ! संपूर्ण रोममूल । खिले स्वेदकण निर्मल ।
जैसे मोतिकी मणिमाल । बनी कंचुकिसी ॥ २८ ॥
महा सुखके अति-रससे ऐसा । मिटने लगी जैसी जीवदशा ।
वहां श्री व्यासाज्ञाका भान कैसा । रहेगा भला ॥ २९ ॥
इतनेमें कृष्णार्जुनके वचन । गूंजने लगे श्रवणोंमें महान ।
लौटा लाया वह शरीरका भान । संजयका तब ॥ ५३० ॥
ध्यान देनसे आनंद-सिंहासन पर चढते ?—
पोंछा तब नयन जल । तथा स्वेद बिंदु निर्मल ।
मुखसे निकले ये बोल । श्रीमान् सुनिये जी ॥ ६१ ॥
ज्ञानेश्वरी २९६