ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैभव-पूर्ण पूजासे मैं किसीका नहीं होता — मुझे क्या कम है ? —
अजी ! आत्मार्पणके बिन । न भाता मुझे कुछ भिन्न ।
अन्य उपचारसे जान । मैं नहीं मिलता ॥ ६७ ॥
जाना कहता जो वह न जानता । संपन्नता दिखाना ही है न्यूनता ।
कृतार्थ हुआ मैं यह जो कहता । वह कुछ नहीं जान ॥ ६८ ॥
दान-यज्ञ-तपका जो अर्जुन । मनमें धरता है अभिमान ।
यहां यह सब तृण-समान । व्यर्थ जान तू ॥ ६९ ॥
जो है ज्ञानमें संपन्न । वेदसे बढ़के कौन ।
अचल शेष समान । कोयी है क्या ? ॥ ३७० ॥
शैयाके नीचे शेष छिपता । वेद नेति नेति है कहता ।
जहां ज्ञान भी है पगलाता । सनकादिकका ॥ ७१ ॥
तापसमें है कहां कौन । जो शूल-पाणीके समान ।
लेता है त्यज अभिमान । पद-जल सिरपे ॥ ७२ ॥
या ऐश्वर्यमें कौन । है लक्ष्मीके समान ।
है श्रियाके समान । घरमें दासी ॥ ७३ ॥
जिसके खेलका घरौंदा एक । कहलाता अमरावति नेक ।
तब हुए खिलौने इन्द्रादिक । उनके सब ॥ ३७४ ॥
जब वह तोड़ती अनचाह खेल । होते रंक इन्द्रादिक ले दल-बल ।
जिसके कटाक्षसे होते वृक्ष फल । सुरतरु दिव्य ॥ ७५ ॥
जिनकी दासियाँ विभिन्न । हैं इतनी शक्ति सम्पन्न ।
वह लक्ष्मी देवी महान । है यहाँ दासी ॥ ७६ ॥
करती वह सर्व भावसे सेवा । छोड़के अभिमान सब पांडव ।
तब कहीं चरण धोनेका दावा । पा सकी वह ॥ ७७ ॥
छोड़कर सब बड़प्पन । भूलकर व्युत्पत्ति सम्पूर्ण ।
होते हैं लघु अणु समान । पाते तब सामिप्य ॥ ७८ ॥
सहस्र करके समीप । चंद्रका भी होता है लोप ।
खद्योत करता प्रलाप । अपने प्रकाशका ॥ ७९ ॥
ज्ञानेश्वरी २८२