सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 359

मेरी भक्ति में कुल जाति आदिका बंधन नहीं—मुझे प्रेम चाहिये—
आती लेनेमें लज्जा नाम । जो अधमोंमें अधमतम ।
ऐसी योनिमें जिन्होंने जन्म । लिया है अर्जुन ॥ ४२ ॥
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथाशूद्रास्तेऽपि यांति परां गतिम् ॥ ३२ ॥
जो हैं पापयोनिके मूढ । जैसे पत्थर सम जड ।
किंतु है मुझमें वे दृढ । सर्व भावसे ॥ ४३ ॥
वाणीमें जिनके मेरे आलाप । नयन भोगते मेरे ही रूप ।
मनमें सतत मेरा संकल्प । भरे रहते हैं ॥ ४४ ॥
मेरी कीर्ति-कथाके बिन । न करते अन्य श्रवण ।
जिनके सर्वांग-भूषण । मेरी सेवा ॥ ४५ ॥
ज्ञानका विषय वे न जानते । केवल मुझ एकको जानते ।
उन्हें ऐसा लाभ मिला तो जीते । नहीं तो मरण ॥ ४६ ॥
ऐसा हुआ जो सम्पूर्ण । सर्व-भाव कर अर्पण ।
जीवनका बना जीवन । मैं ही एक ॥ ४७ ॥
पाप योनिमें हुआ जनन । सुनके भी न हुआ पठन ।
तुलनामें उनका वज़न । मुझसे कम नहीं ॥ ४८ ॥
भक्ति संपन्नताके कारण । देव बने राक्षसोंसे हीन ।
मेरा नरसिंहका भूषण । उसकी महिमा ॥ ४९ ॥
किया प्रह्लादका अंगीकार । मेरे स्थानमें पांडुकुमार ।
प्रह्लाद कथामें साक्षात्कार । होता मेरा ही ॥ ४५० ॥
उसका है दैत्य-कुल आखर । इंद्रको नहीं वह अधिकार ।
यहां है भक्ति महिमा अपार । कुल-जातिकी नहीं ॥ ५१ ॥

करके आसरा मेरा भोले स्त्री-वैश्य-शूद्र भी ।
या पाप-योनिके जीव पाते हैं सुख शाश्वत ॥ ३२ ॥
(37) २८९ राज-विद्या-समर्पणयोग