ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजाज्ञाके होते चार अक्षर । वह भी चामके टुकडे पर ।
वह टुकडा देता है अपार । वस्तु-मात्र ॥ ५२ ॥
आज्ञाके उन अक्षरके बिन । स्वर्ण-रजत भी प्रमाण-हीन ।
उस अक्षर चामके कारण । मिलते सर्व वस्तु ॥ ५३ ॥
उत्तमता तो तभी है । यथा सर्वज्ञता भी है ।
मन बुद्धि भारता है । जब मेरे प्रेमसे ॥ ५४ ॥
इसलिए कुल जाति वर्ण । ये सब ही हैं बिना कारण ।
मुझमें हैं अनन्य शरण । सार्थक एक ॥ ५५ ॥
मुझमें मिलनेके बाद कोयी भिन्नता नहीं रहती—
जब किसी न किसी कारण । मन होता मद्रूपमें लीन ।
तब होता है पुर्णरूपेण । जाति कुलादि व्यर्थ ॥ ५३ ॥
तब तक नाले कहलाते । गंगामें जब नहीं मिलते ।
फिर मात्र गंगाजल होते । गंगारूप हो ॥ ५७ ॥
जैसे खदिर चंदनादि काष्ठ । तब तक भिन्न रहते स्पष्ट ।
यज्ञाहुति देने पर है नष्ट । भिन्नता सारी ॥ ५८ ॥
वैसे हैं क्षत्रिय वैश्य स्त्रियां । शूद्र अन्त्यजादि कहलाया ।
मुझमें विलय न हो गया । तब तक ही सब ॥ ५९ ॥
जाति कुल व्यक्ति फिर बनता शून्य । होता है जब चित्त मुझमें अनन्य ।
घुलते जैसे लवण कण सामान्य । सागरमें वैसे ॥ ४६० ॥
तब तक नदी नदोंका नाम रहता । वैसे ही पूर्व पश्चिम प्रवाह रहता ।
किंतु जब सागरमें मिल जाता । सब होता एकरूप ॥ ६१ ॥
लेकर कोयी न कोयी निमित्त । होता लय जब मुझमें चित्त ।
फिर होता है उसमें निश्चित । मद्रूप ऐसे ॥ ६२॥
अव्यभिचारी शत्रुतासे भी मेरी प्राप्ति होती है —
तोडने हेतु पडा पारस पर । लोहेका घन उसे स्पर्श कर ।
होगा निश्चित ही सुवर्ण सत्वर । सहज-भावसे ॥ ६३ ॥
ज्ञानेश्वरी २९०