ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 350, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंजैसे शाखा पल्लव वृक्षके । सारे हैं ये एक ही बीजके ।
किंतु पानी लेते हैं जडके । धर्म वैसे ही ॥ ४६ ॥
या जो दस इन्द्रियां हैं । सब एक ही देहकी हैं ।
इनके विषय जाते हैं । एक ही स्थानपे ॥ ४७ ॥
किंतु मृष्टान्न कैसे मधुर । कानोंमें भरना सुखकर ।
कैसे जाने सौरभ मधुर । सूँघकर नमक ॥ ४८ ॥
जैसे जिह्वासे रस चखना । घ्राणसे ही परिमल लेना ।
वैसे मेरा भजन करना । मुझे जानकर ॥ ४९ ॥
मुझे न जानकर भजन । करते हैं वह पार्थ जान ।
तभी कर्मके चक्षु हैं ज्ञान । वह हो निर्दोष ॥ ३५० ॥
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥२४॥
वैसे देखें तो हे पार्थ । यज्ञोपहार समस्त ।
मेरे बिन कहो भोक्ता । कौन है अन्य ॥ ५१ ॥
सकल यज्ञका मैं आदि । इसका मैं ही हूं अवधि ।
किंतु मुझे छोड दुर्बुद्धि । भजते देवोंको ॥ ५२ ॥
गंगाजीको गंगोदक ही जैसे । देते हैं देव पितरोद्देश्यसे ।
देते हैं मेरा ही मुझको वैसे । भावसे अन्य ॥ ५३ ॥
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपिमाम् ॥२५॥
इसीलिए सुन पांडुसुता । मुझे न मिलकर सर्वथा ।
दिया मनमें रख जो आस्था । वहीं गया ॥ ५४ ॥
भोक्ता मैं सब यज्ञोंका फलदायक भी स्वयं ।
न जाने तत्व जो मेरा गिरते हैं सदा वही ॥ २४ ॥
देवोंके भक्त देवोंसे पितृओंसे पितृ-पूजक ।
भूतोंके भक्त भूतोंसे मेरे जो मिलते मुझे ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी २८०