ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिनकी आस्था है शीतल । बढाती सत्कर्मकी वेल ।
सत्य है जीवित केवल । उनके संकल्पसे ॥ ७७ ॥
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥
सबके लिए मेरा द्वार खुला है—
आशिर्वादसे उनके । बने आयुष्य अग्निके ।
दिया सिंधुने उनके । प्रेमसे नीर ॥ ७८ ॥
मैंने किया लक्ष्मीको कुछ दूर । लिया हाथ कौस्तुभ उठाकर ।
बढाया हृदय आगेकी ओर । चरण रजके लिए ॥ ७९ ॥
अब तक वह पद मुद्रा । हृदयपे धरी है सु-भद्र ।
अपने ही ऐश्वर्य समुद्र । रक्षा हेतु ॥ ४८० ॥
जिनका क्रोध है अर्जुन । कालाग्निका वसतिस्थान ।
उनका प्रसाद महान । देता सर्व-सिद्धि ॥ ८१ ॥
ऐसे पुण्य-पूज्य जो ब्राह्मण । मुझमें होते अति निपुण ।
होके नित मत्परायण । यह क्या कहना ? ॥ ८२ ॥
चंदन-वृक्षके समीप होनेसे । तथा उनके पवनके स्पर्शसे ।
निर्जीव नीम भी हुआ योग्यतासे । चढा प्रभु मस्तक पर ॥ ८३ ॥
फिर चंदन वहां न पहुंचेगा । इस बातको मन कैसे मानेगा ।
अथवा चंदन वहां पहुंचेगा । यह कहना पडे क्यों ? ॥ ८४ ॥
शीतलताकी अपेक्षा कर । महादेवने मस्तक पर ।
धारण किया जो निरंतर । अर्ध चन्द्र ही ॥ ८५ ॥
जहां शीतलतामें अप्रतिम । सुवासमें चंद्रसे भी उत्तम ।
ऐसा चंदन क्यों न सर्वोत्तम । लगायें सर्वांगपे ॥ ८६ ॥
वहां ब्रह्मर्षि राजर्षि इनकी बात क्या रही ।
भज तू मुझ आया है दुखी नश्वर लोकमें ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी २९२