ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजीवन उसका इस किनारे आया । इसलिए डूबा हुआ भी व्यर्थ गया
रहा ही ऐसा नहीं जो पाप किया । भक्तिके कारण ॥ १८ ॥
पहले था जो दुराचारी महान् । किंतु पश्चात्ताप तीर्थमें कर स्नान ।
मेरी शरणमें आया जो अर्जुन । सर्व भावसे ॥ १९ ॥
उसका है अब पवित्र कुल । अभिजात्य तथा अति निर्मल ।
जन्मका उसको मिला है फल । भक्तिके कारण ॥ ४२० ॥
उसने किया सब अध्ययन । तथा समस्त तप अनुष्ठान ।
अष्टांग-योग भी सुन अर्जुन । सिद्ध उसको ॥ २१ ॥
रहने दे अब यह पार्थ । जिसकी चाह है "मैं" सतत ।
कर्म-बंधनसे वह मुक्त । सर्वदा ही ॥ २२ ॥
मन-बुद्धि सब एक गांठमें । बांध कर दी वह पिटारीमें ।
वह पिटारी मेरे स्वरूपमें । रख दी धनंजय ॥ २३ ॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥
स-समय वह मद्रूप होगा । चितमें तेरे यह भाव होगा ।
सदैव जो अमृतमें रहेगा । मरेगा कैसे ॥ २४ ॥
तभी रात्री कहलाती है । सूर्य जब नहीं होता है ।
भद्भक्ति बिन जो होता है । वह सब पाप ॥ २५ ॥
इसलिए उसका चित । रहता मुझमें सतत ।
तभी होता वह निश्चित । मद्रूप तत्वतः ॥ २६ ॥
जैसे दीपसे दीप है जलता । वहां पहला कौन न जानता ।
वैसे सदैव जो मुझे भजता । होता वह मैं ही ॥ २७ ॥
फिर मेरी ही नित्य-शांति । उसकी दशा वही कांति ।
जीवित रहता स-भक्ति । मेरे ही जीवसे ॥ २८ ॥
होगा जो शीघ्र धर्मात्मा शांति शाश्वत पाकर ।
जान निश्चित तू मेरे भक्तका नाश है नहीं ॥ ३१ ॥
२८७ राज-विद्या-समर्पणयोग