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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 355

क्रिया-जात जो संपूर्ण । होगा तुझसे अर्जुन ।
करना तू यह मान । है सब मदर्थ ॥ ४०० ॥
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥
जैसे अग्निकुंडमें पड बीज । अंकुर दशा खोता है सहज ।
वैसे अर्पित शुभाशुभ मुझ । न फलते कभी ॥ १ ॥
अनर्पित कर्म जब रहता । सुख दुःखमें वह फलता ।
उसके भोगार्थ आना पडता । नया जन्म लेकर ॥ २ ॥
है जो मदर्पित कर्म । पोंछता मरण-जन्म ।
करे जन्म-सह श्रम । अन्य सब नष्ट ॥ ३ ॥
यह है संन्यस्तकी युक्ति । सरल होती फल-प्राप्ति ।
आचरणमें इसे अति । शीघ्र ही लाना ॥ ४ ॥
इससे देह-बंध नहीं घडता । सुख-दुखाब्दिका संबंध न आता ।
सुखका है सुखमें ही ऐक्य होता । सहज-रूपसे ॥ ५ ॥
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ २६ ॥
पूछेगा पार्थ तू वह कैसा । सर्व भूतमें सदा एकसा ।
जहां नहीं आप पर ऐसा । भेद-भाव ॥ ६ ॥
जो सदा सर्वत्र मुझे देखते हैं वे सदेह मुक्त हैं, मद्रूप हैं—
इस भांति मुझे जानकर । तोड कर्तृत्वका अहंकार ।
जीव-भावसे जो कर्मकर । भजते मुझको ॥ ७ ॥

जिससे तोडके सारे कर्म-बंध शुभाशुभ ।
साधके योग-संन्यास पायेगा मुक्त हो मुझे ॥ २८ ॥
सम मैं सब भूतोंसे प्रियाप्रिय न है मुझे ।
किंतु है मुझमें भक्त भक्तमें मैं बसा नित ॥ २९ ॥
२८५ राज-विद्या-समर्पणयोग