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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥
किंतु ऐसा न करके प्राणिजात । व्यर्थ ही खोता है जो अपना हित ।
मानो तैरते हैं जलमें सतत । हथेलीके ही ॥ ५१ ॥
या अमृतकुंडमें डूबकर । होठोंको दृढतासे दबाकर ।
स्मरण करता है निरंतर । डबरेका पानी ॥ ५२ ॥
किसलिये यह ऐसा करना । अमृतमें डूबकर मरना ।
सुखसे अमर क्यों नहीं होना । अमृतमें ही ॥ ५३ ॥
फलशाका पिंजडा तजकर । अनुभव पंखसे धनुर्धर ।
क्यों न करें चिदंबर संचार । समर्थ भावसे ॥ ५४ ॥
चिदाकाशमें ऊंचाई पर । करें सुखसे उन्मुक्त संचार ।
उसका है अनंत विस्तार । अपनाही ॥ ५५ ॥
असीम पर क्यों सीमाका नियमन । मुक्त निराकारको आकार बंधन ।
स्वयंसिद्धका करना क्यों बलिदान । साधन पर ॥ ५६ ॥
किंतु मेरा यह कथन । विचारान्तमें भी अर्जुन ।
न करेगा जीवोंका मन । इसका स्वीकार ॥ ५७ ॥
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नामिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५ ॥
मैं सर्वव्यापी हूं किंतु --
क्यों कि योगमायाके परदेसे । अंधत्व आनेके कारणसे ।
न देखता प्रकाश बलसे । मुझको कभी ॥ ५८ ॥
पूजते व्यक्त हो रूप बुद्धि-हीन न जानके ।
अव्यक्त श्रेष्ठ जो रूप मेरा अंतिम शाश्वत ॥ २४ ॥
घिरा मैं योग मायासे न हूं प्रकट विश्वसे ।
अजन्मा नित्य मैं ऐसा न जाने मूढ लोग जो ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी २१६

ऐसा देखे तो मैं नहीं । ऐसी वस्तु नहीं कहीं ।
जैसा पानी होता नहीं । रसके बिना ॥ ५९ ॥
पवन किसको नहीं छूता । आकाश कहां नहीं रहता ।
वैसी ही सर्वत्र व्यापकता । एक मात्र मेरी ॥ ६० ॥
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६ ॥
अतीतमें जितने भूत । मैं ही वे जान तू सतत ।
आज हैं विश्वमें जो पार्थ । वे भी मैं हूं ॥ ६१ ॥
भविष्यमें होंगे जितने ही । अलग मुझसे वे भी नहीं ।
यह बात है कहनेकी ही । वैसा न होता कछु ॥ ६२ ॥
अजी ! रज्जूके भुजंगको जैसे । काल पीला न कह सके ऐसे ।
भूतमात्र सब मिथ्यापनसे । हैं अनिश्चित ॥ ६३ ॥
सदा मैं सुन पांडुसुत । होने पर भी अखंडित ।
संसार ग्रस्त सब भूत । अन्य प्रकारसे ॥ ६४ ॥
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परंतप ॥ २७ ॥
कहता हूं इसका कारण । अब तू ध्यान देकर सुन ।
अहंकार-तनका वरण । हुआ तब ॥ ६५ ॥
जन्म हुआ कुमारीका । आया उसे यौवन कामका ।
हुआ द्वेषसे ब्याह उसका । सुनो तब ॥ ६६ ॥
आपत्य हुआ उन दोनोंके । द्वंद्व मोह नाम हैं उनके ।
बड़े वह प्यारमें दादाके । जो था अहंकार ॥ ६७ ॥
हुये जो और जो होंगे भूत हैं आज जो यहां ।
सबको जानता हूं मैं मुझे कोयी न जानते ॥ २६ ॥
राग औ' द्वेषसे उठे चित्तमें मोह-द्वंद्व जो ।
जगतके सभी प्राणि घिरे हैं इससे यहां ॥ २७ ॥
२१७ ज्ञान-विज्ञानयोग
(28)

धृतिका जो प्रतिकूल रहता । आशा-रससे परिपुष्ट होता ।
नियमका अनादर करता । द्वंद्व-मोह ॥ ६८ ॥
असंतुष्टताकी मदिरा । मत्त होकर धनुर्धर ।
विकार स्त्री-सह संसार । करता विषयोंमें ॥ ६९ ॥
जिससे भाव-शुद्धिकी राह पर । फैलाये विकल्पके कांटे अपार ।
खुल जाते सब कुपथ दो चार । अप्रवृत्तिके ॥ ७० ॥
इसने प्राणि गड़बड़ाये । संसार खडियामें फंसाये ।
फिर डंडुकेसे पिटवाये । महा-दुःखके ॥ ७१ ॥
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८ ॥
भाव-शुद्धिकी राह पर । विकल्प-शूल देखकर ।
नहीं आते जो लौट कर । बुद्धि-भ्रमसे ॥ ७२ ॥
थोडेसे जो मद्रूप होते हैं उनको अंतकालमें दुःख नहीं होता--
पगसे ही एक-निष्ठाके । शूलांकुरोंको विकल्पके ।
रौंध छोडे महा-पापके । वन-प्रांत ॥ ७३ ॥
सत्कर्मकी फिर दौड़-लगायी । मेरे सामिप्यकी मंजिल पायी ।
महा-विपत्तिसे जान बचायी । बटमारोंके ॥ ७४ ॥
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९ ॥
सहज ही सोचने पर पार्थ । जन्म मरणकी मिटती कथा ।
इस भांतिके प्रयत्नोंमें आस्था । उत्पन्न होती ॥ ७५ ॥
गँवाये जिसने पाप अपने पुण्य कर्मसे ।
दृढतासे भजते वे द्वंद्व मोह हटाकर ॥ २८ ॥
जुटे मेरे सहारे जो जीतते जन्म मृत्युको ।
जानते ब्रह्म वे पूर्ण तथा अध्यात्म-कर्म भी ॥ २९ ॥
ज्ञानेश्वरी ३१८

उनका वह यत्न ही एक काल । देता समय पर-ब्रह्मका फल ।
पक्वतामें चूता रस पल पल । तब पूर्णताका ॥ ७६ ॥
कृतार्थतासे विश्व जब भरता । मिटती है अध्यात्मकी अपूर्णता ।
तथा कर्मका काम नहीं रहता । होता मन विलय ॥ ७७ ॥
उसकी ऐसा अध्यात्म लाभ । होता है सुन पुरुषर्षभ ।
उसका पूंजी हूं मैं सुलभ । इस उद्यममें ॥ ७८ ॥
साम्यके वृद्धिसे उसके । संधते व्यापार उसके ।
वहां दारिद्र्य जो द्वैतके । रहता नहीं ॥ ७९ ॥
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३० ॥
सब अधिभूत मुझको । प्रतीतिसे अधिदैवको ।
जिन्होंने जाना यथार्थको । धनंजय ॥ १८० ॥
अनुभवके ज्ञान बलसे । जानता मैं अधियज्ञ इसे ।
वह शरीरके वियोगसे । अकुलाता नहीं ॥ ८१ ॥
अन्यथा आयुष्य सूत्र जब टूटता । प्राणियोंका तब हृदय तड़पता ।
सजीवके चितमें भी युगांत आता । देखकर यह ॥ ८२ ॥
किंतु यह नहीं जाने कैसा । ज्ञानियोंका नहीं होता ऐसा ।
अंतकालमें भी वह सहसा । मुझे भूलते नहीं ॥ ८३ ॥
अन्यथा तू यह जान । ऐसे जो महा-निपुण ।
औ' युक्त अंतःकरण । योगी हैं वही ॥ ८४ ॥
सातवे अध्यायका ज्ञानेश्वर कृत उपसंहार और आठवेकी भूमिका—
तब यह शब्द कूपका तल । न पहुंचा पार्थ कर-कमल ।
पल एक पार्थ था उस काल । पिछडा हुआ ॥ ८५ ॥
अधिभूताधि दैवोंमें मुझे जो अधि-यज्ञमें ।
प्रयाण-कालमें भी जो जानते रह सावध ॥ ३० ॥
२१९ ज्ञान-विज्ञानयोग

जहां तद्ब्रह्मवाक्फल । जो ज्ञानार्थसे रसाल ।
साभिप्राय परिमल । भावोंके हैं ॥ ८६ ॥
जो सहज कृपामंदानिल । कृष्णाद्रुमका वचन-फल ।
लाया अर्जुन श्रवण-तल । अकस्मात ॥ ८७ ॥
जो ये तत्व सिद्धांतसे बनाये । ब्रह्म-रस सागरमें हैं डुबोये ।
फिर वैसे ही ये जो पगाये । परमानंदमें ॥ ८८ ॥
उसके निर्मल सौंदर्यसे । ज्ञान-उन्मेशकी वासनासे ।
चूने लगा पार्थकी जिव्हासे । विस्मयामृत ॥ ८९ ॥
लाभसे उस सुख-संपत्तिके । सुरसुराहटसे हृदयके ।
व्यंग दिखाकर स्वर्ग-सुखके । हंसने लगा ॥ २९० ॥
फलका बाह्य सलोनापन । अनुभव करके अर्जुन ।
रस-स्वादमें रसना मन । खो बैठा सहज ॥ ९१ ॥
उठाकर वह वाक्फल । अनुमानका करतल ।
प्रतीति-मुखमें तत्काल । भरने लगा ॥ ९२ ॥
किंतु विचार मुखमें न समाता । हेतुका दांत नहीं काट सकता ।
इसलिये पार्थ मुख न लगाता । उस फलको ॥ ९३ ॥
कहता तब अर्जुन हो चमत्कृत । तारागण ये जलमें प्रति-बिंबित ।
ऐसे हैं तेरे ये वाक्फल सुशोभित । इसमें मैं उलझा ॥ ९४ ॥
नहीं ये तेरे साधारण शब्द । है अनुभव-गगन विषद ।
थाह न पाती बुद्धि भाव-पद । डूब जाती है ॥ ९५ ॥
मनमें जान यह गोष्ट । कृपार्थ पुनः किरीटी ।
पुनरपि घुमाता दृष्टि । कृष्ण चरणमें ॥ ९६ ॥
विनय करता अर्जुन । ये सात ही पद नवीन ।
ग्रहण न करते कान । आश्चर्यकारक ॥ ९७ ॥
श्रवण करके ही ये केवल । इनके प्रमेयोंका जो है जाल ।
करेगा मन इन्हें करतल । ऐसे लगा था ॥ ९८ ॥
ऐसा नहीं यह निश्चय । देख अक्षर समुदाय ।
है साश्चर्य-जीव आश्चर्य । देव मेरा ॥ ९९ ॥
ज्ञानेश्वरी २२०

कानोंके इन गवाक्षोंसे । शब्द-किरण प्रवेशसे ।
मन हुआ चमत्कृतिसे । चकित मेरा ॥ २०० ॥
चाहता मैं भावको जानना । कहनमें समयको खोना ।
कष्ट कर प्रभु निरूपण । कर तू सत्वर ॥ १ ॥
पीछेका कर अवलोकन । अगले पर रख नयन ।
स्व-इच्छाका भी कर दर्शन । पूछना चतुराइसे ॥ २ ॥
देख अर्जुनका चतुरपन । न कर मर्यादाका उल्लंघन ।
करता हृदयका आलिंगन । श्रीकृष्णके ॥ ३ ॥
कैसे पूछना है प्रश्न । रखकर अवधान ।
जानता यह अर्जुन । भली भांति ॥ ४ ॥
अर्जुनका है ऐसा पूछना । श्रीकृष्णका भाव समझाना ।
संजयको भाये ये वचन । कहेगा वह प्रेमसे ॥ ५ ॥
सुनो उस संवादको दे ध्यान । करूंगा देश भाषामें कथन ।
कानसे आगे करके नयन । जानेंगे वह ॥ ६ ॥
बुद्धि-जिव्हासे चखनेसे पूर्व अक्षर । देखकर नयन उनका अलंकार ।
अनुभवेंगे इंद्रिय अपरंपार । सुख संतोषको ॥ ७ ॥
जैसे मालतीका फूल । घ्राणसे है परिमल ।
लेनेसे पूर्व कोमल । सुख लेते नयन ॥ ८ ॥
वैसे है देशीका जो सौंदर्य । करायेगा इंद्रियसे राज्य ।
फिर करेगा वह प्रमेय- । सुधा-पान ॥ ९ ॥
जहां होती है वाचा मौन । वह करूंगा मैं कथन ।
यह ज्ञानदेव-वचन । जो हैं निवृत्ति-दास ॥ २१० ॥
गीता श्लोक ३०
ज्ञानेश्वरी ओवी २१०.

८
सातत्ययोग
अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ १ ॥
अर्जुनके सात प्रश्न --
फिर कहा अर्जुनने । जी सुनलिया मैंने ।
अब जो पूछा मैने । कहो वह ॥ १ ॥
कहो क्या है वह ब्रह्म । किसका नाम है कर्म ।
अथवा क्या है अध्यात्म । कहो मुझे ॥ २ ॥
प्रभो ! अधिभूत यह है कैसे । औ' अधिदैवत कहते किसे ।
यह सुनाओ प्रकट रूपसे । जो मैं समझूं ॥ ३ ॥
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ २ ॥
प्रभो अधियज्ञ क्या है । इस देहमें कौन है ।
समझमें न आता है । अनुमानके भी ॥ ४ ॥
अर्जुनने कहा
किसको कहते ब्रह्म तथा अध्यात्म-कर्म क्या ।
अधिभूत कहो क्या है तथा क्या अधिदैव भी ॥ १ ॥
अधियज्ञ यहां कौन कैसा है इस देहमें ।
कैसे प्रयाणमें योगी निग्रही जानते तुझे ॥ २ ॥

तथा कैसे किया नियतांतःकरण । प्रयाण-कालमें कैसे हो तव ज्ञान ।
वह कैसे कहो तुम मुझे श्रीकृष्ण । पूर्ण-रूपसे ॥ ५ ॥
ज्ञान देनेमें उदार प्रसन्न प्रभु—
कोई सोया घरमें चिंतामणिके । यदि योगसे ही अपने भाग्यके ।
बोल भी उसके बड़बड़ानेके । न जाते व्यर्थ ॥ ६ ॥
अर्जुनके शब्दके साथ । मनमें कहते हैं नाथ ।
“तूने पूछा यही उचित ।” सुन तू अब ॥ ७ ॥
शावक है अर्जुन कामधेनुका । आसरा है ऊपर कल्पतरुका ।
होना उसके मनोरथ सिद्धिका । आश्चर्य क्या ॥ ८ ॥
क्रोधसे देता प्रभु जिसको मार । उसको होता है ब्रह्म साक्षात्कार ।
जिसको देता वह सीख कृपाकर । उसको क्या न मिलेगा ॥ ९ ॥
जब होते हम श्रीकृष्ण-शरण । कृष्ण होता अपना अंतःकरण ।
तब अपना संकल्पका अंगन । भरता महा-सिद्धिसे ॥ १० ॥
किंतु ऐसा जो प्रेम । पार्थमें है निःसीम ।
तभी उसका काम । सदा फलता ॥ ११ ॥
इस कारण ही वह अनंत । जानकर उसका मनेरथ ।
भर रखता थाली पकवानयुत । ज्ञानान्नसे आप ॥ १२ ॥
आपत्य जब स्नेहसे दूर होता । भूख उसकी अनुभवती माता ।
नहीं तो क्या वह शब्दसे कहता । मुझे दूध दे री ॥ १३ ॥
कृपालू गुरुदेवके यहां । आश्चर्य नहीं इसका जहां ।
जाने दो यह प्रभुने वहां । कहा क्या सुनो ॥ १४ ॥
भगवान उवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ ३ ॥
श्री भगवानने कहा
ब्रह्म अक्षर है श्रेष्ठ अध्यात्म निज-भाव जो ।
भूत-सृष्टि सजाता जो वह व्यापार कर्म है ॥ ३ ॥
२२३ सातत्ययोग

सभी साकार वस्तुओंमें ओतप्रोत अविनाशी-सत्त्व है ब्रह्म --
कहता है तब सर्वेश्वर । टूटे हुए हैं सब आकार ।
उसमें भी जो ठूंसने पर । टूटता नहीं ॥ १५ ॥
देखने पर बैसी उसकी सूक्ष्मता । शून्य किंतु शून्य नहीं है स्वभावता ।
गगनसे वह है छननेमें आता । जो है सूक्ष्मतम ॥१६॥
इस भांती यह विरल होकर । विज्ञान-पटमें भर हिलने पर ।
चूता नहीं जो वह पांडुकुमार । परब्रह्म है जान ॥ १७ ॥
सहज नित्यत्व है आध्यात्म
तथा जो आकारके साथ । न जानता जन्मकी बात ।
आकार-लोपमें समस्त । न जानता नाश ॥ १८ ॥
जो है अपना ही सहजत्व । जिसको है ब्रह्मका नित्यत्व ।
यही है जो सहज-नित्यत्व । कहलाता अध्यात्म ॥ १९ ॥
बिना कर्ताके अव्यक्तमें दीखनेवाली हलचल कर्म है---
जैसे गगनमें निर्मल । न जाने कैसे किसी काल ।
उमड फैलते बादल । नाना रंगके ॥ २० ॥
उस विशुद्ध अमूर्तमें जैसे । महत्तत्त्वादि जो भूत भेदसे ।
ब्रह्मांडके विभिन्न अंकुरसे । फूटने लगते ॥ २१ ॥
निर्विकल्पके उस ऊसर पर । फूटता आदि संकल्पका अंकुर ।
फिर बनते जाते घने आकार । ब्रह्म-गोलके ॥ २२ ॥
देखनेसे एकेकके भीतर । भरा है बीजसे ही भरपूर ।
होने-जाने वाले जीवोंकी अपार । गणना ही नहीं ॥ २३ ॥
फिर उन ब्रह्मगोलकोंके जो अंशांश । जानते आदि संकल्प असम साहस ।
जिससे बढ़ती ही जाती है अनायास । सृष्टि सर्वत्र ॥ २४ ॥
पर एक ही है दूसरेके बिन । पर-ब्रह्म ही भर रहा संपूर्ण ।
यहां अनेकत्वका आया महान । पूर जैसा ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी २२४

न जाने सब विषम आये कैसे । व्यर्थ ही चराचर रचते ऐसे ।
औ' प्रसव योनिके अनंत जैसे । दीखते प्रकार ॥ २६ ॥
यहां है जीव-भावके कोंपल । गगनातीत दीखते सकल ।
देखें तो इनके जन्मका मूल । वहां है शून्य ॥ २७ ॥
मूलमें कर्ता कोई दीखता नहीं । तथा कारण कुछ नहीं कहीं ।
किंतु कार्य आप रुकता ही नहीं । बढ़ता जाता ॥ २८ ॥
ऐसे कर्ताके बिन गोचर । अव्यक्तमें जो यह आकार ।
निपजता है यह व्यापार । उसका नाम कर्म ॥ २९ ॥
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ ४ ॥
बादलके समान जो बनता और बिगडता है वह अधिभूत —
अब जो अधिभूत कहलाता । वह भी संक्षेपमें हूं कहता ।
जो है बनता और बिगड़ता । बादल जैसा ॥ ३० ॥
ऐसा व्यर्थ है अस्तित्व जिसका । न होता सहज-रूप जिसका ।
पांच मिल लाते रूप जिसका । धनुर्धर ॥ ३१ ॥
पंच भूतोंका आश्रय लेकर । उनके संयोगसे ले आकार ।
और वियोगमें है जाता मर । नाम रूपादिक ॥ ३२ ॥
अहंकारसे अलग-सा बना आत्मा ही अधिदैव—
यह है अधिभूत कहलाता । पुरुष अधिदैव कहलाता ।
जो प्रकृति उपार्जित भोगता । भोग सर्व ॥ ३३ ॥
चक्षु है जो चेतनका । अध्यक्ष है इंद्रियोंका ।
वृक्ष संकल्प-पक्षिका । देहांतमें ॥ ३४ ॥
परमात्मा ही है जो किंतु भिन्न । है अहंकार निद्रामें मगन ।
इसीलिये स्वप्नमें होता खिन्न । अथवा प्रसन्न भी ॥ ३५ ॥
अधि-भूत विनाशी जो जीवत्व अधि-दैवत ।
अधि-यज्ञ स्वयं मैं हूं देहमें यज्ञ-पूत जो ॥ ४ ॥
२२५ सातत्ययोग
(29)

अध्याय ६: आत्मसंयमयोग / ध्यानयोग

कहलाता यह जीव। जैसा इसका स्वभाव।
इसे जान अधिदैव। पंचायतनका ॥ ३६ ॥
शरीर भाव रहित आत्मा अधियज्ञ --
यहां शरीर-ग्राममें जान। शरीर-भाव उपशमन ।
करता हूँ अधियज्ञ बन। पांडुकुमार ॥ ३७ ॥
यह सब मैं ही हूँ, अविद्याके कारण भिन्नता दीखती है—
यहां अधिदैवाधिभूत। यह सब मैं हूँ समस्त।
वंगयुत स्वर्ण जो नित। हीन होता जैसे ॥ ३८ ॥
फिर भी न मलता कांचन। नहीं होता वंगके समान।
किंतु मिल वंगसे हीन। कहलाता है ॥ ३९ ॥
वैसे अधिभूतादि सब। अविद्या सहित हो तब।
अलग मानते हैं जब। धनंजय ॥ ४० ॥
अविद्याका पटल उठता। भेद-भावका अंत है होता।
और दोनोंका एक रूप होता। तो वे दो थे क्या ? ॥ ४१ ॥
सलौनी अलक लट एक। स्फटिक शिलातलमें रख।
ऊपरसे उसे जब देख। लगती टुटी हुई ॥ ४२ ॥
जैसे अलक-लट हटायी। न जाने दरक कहां गयीं।
अंक देकर की क्या जुड़ायी। स्फटिक-शिलाकी ॥ ४३ ॥
मूलकी वह जो अखंडित थी। केश-संगसे खंडित हुई थी।
उसके हटनेसे ही आयी थी। मूल रूपमें ॥ ४४ ॥
ऐसा अहंभाव जब जाता। मूलमें रहती है एकता।
जहां हो ऐसी वास्तविकता। वह अधियज्ञ मैं ॥ ४५ ॥
किंतु हमने अब तुझ। सकल-यज्ञ हैं कर्मज।
कहा धरकर जो काज। मनमें पार्थ ॥ ४६ ॥
विश्राम जो जीव-जातिका। निधान नैष्कर्म्य-सुखका।
प्रकट रूप मैं उसका। कहता पार्थ ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी २२६

वैराग्य और अभ्याससे अविद्या-मल दूर करो—अधियज्ञ
वैराग्य ईंधनसे भरपूर । इंद्रियानल प्रज्वलित कर ।
विषय-द्रव्य आहुति देकर । उसमें तब ॥ ४८ ॥
वज्रासन धरातल बनाकर । आधार-मुद्रा-वेदिका रचकर ।
शरीर-मंडपका शोधन कर । अनंतर पार्थ ॥ ४९ ॥
कुंडमें संयमाग्निके । मंत्र-घोषसे युक्तिके ।
देना इंद्रिय-द्रव्यके । शाकल्य नित्य ॥ ५० ॥
फिर मन-प्राण तथा संयम । है हवन संप्रदाय संभ्रम ।
इससे तुष्ट करना निर्धूम । ज्ञानानल ॥ ५१ ॥
ऐसा यह सकल-साधन । ज्ञानाग्निमें करनेसे अर्पण ।
ज्ञेयमें लय होकर ज्ञान । ज्ञेय ही रहता ॥ ५२ ॥
इसका नाम अधियज्ञ । ऐसा बोला है जब सर्वज्ञ ।
तब पार्थने जो अति प्राज्ञ । जान लिया पूर्ण ॥ ५३ ॥
अंतकालकी स्थितिका वर्णन—
जानकर यह बोले कृष्ण । कर रहा है न तू श्रवण ।
देख कृष्णका मुदित मन । खिल उठा पार्थ ॥ ५४ ॥
सन्तानकी तृप्तिसे तृप्त होना । या शिष्यकी पक्वतासे खिलना ।
जानते मात्र सद्गुरु महान । या जन्मदात्री ॥ ५५ ॥
तब खिल उठे सात्त्विक-भाव । नारायणमें नरसे भी पूर्व ।
किंतु समता-बुद्धिसे ही देव । संयत आप ॥ ५६ ॥
पक्व-फलका है परिमल । या शीतल अमृत-कल्लोल ।
वैसे कोमल तथा सरल । बोले शब्द ॥ ५७ ॥
श्रोतृ-श्रेष्ठ तू अर्जुन । मेरी बात यह सुन ।
जलानेवाला जो ज्ञान । अलाता मायाको ॥ ५८ ॥
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्
यः प्रयाति सम्मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥५॥
प्रयाण कालमें भी जो मेरे ही ध्यानमें रत ।
जाते हैं तजके देह मिलता मुझ निश्चित ॥ ५ ॥
२२७ सातत्ययोग

मेरे स्मरण-पूर्वक जो शरीर छोड़ता है वह मद्रूप होता है—
अधियज्ञ कहते हैं जिसे। अभी कहा था तुझसे ऐसे।
जीवनमें जो जानते उसे। औ' मरते समय भी ॥ ५९ ॥
शरीर एक झोल मानकर। अपनेमें ही आप होकर।
मठ जैसे व्योमसे भर कर। रहता उसीमें ॥ ६० ॥
इस प्रतीतिके अंगनमें। निश्चलताके अंतःकक्षमें।
सोते हैं सो विषयोंको उनमें। नहीं प्रवेश ॥ ६१ ॥
अंतर्वाह्य ऐसा ऐक्य भरा है। जो आप मद्रूप बन गया है।
पंच-भूतोंका झोल उतरा है। अनजाने बाहर ही ॥ ६२ ॥
जीवनमें उभयत्व नहीं जिसके। मरणमें संकर कैसे जी उनके।
तभी न हिले अनुभूति उदरके। निश्चय रूप जो ॥ ६३ ॥
वह है ऐक्य रससे ढली हुई। या नित्यता हृदयमें बसी हुई।
या समरस-सिंधुसे धुली हुई। न होती जो मलिन ॥ ६४ ॥
मटका अथाह पानीमें डूब कर। जलसे भरकर अंदर बाहर।
दैव गतिसे मानो टूटा वहीं पर। तब होगा क्या रीता ? ॥ ६५ ॥
या सांपने केंचुला उतारा। या किसीने कपडा उतारा।
इससे टूटा क्या अंग सारा। या अवयव ॥ ६६ ॥
वैसा है भासमान शरीराकार। गिरता तब आत्मवस्तु अंतर।
भरा है बोधसे जहां भरपूर। अपनेमें आप ॥ ६७ ॥
मुझे इस प्रकार। अंतमें जानकर।
छोड़ते हैं शरीर। होते हैं मद्रूप ॥ ६८ ॥
इसलिये तू मेरे स्मरण पूर्वक युद्ध-रत हो जा—
अथवा वैसे भी साधारण। जिसे स्मरता अंतःकरण।
प्राप्त करता है जो मरण। तद्रूप होता ॥ ६९ ॥
कोई एक अकुलाहटसे। भागते हुए वायु-वेगसे।
सहसा फिसलकर जैसे। गिरा कुएमैं ॥ ७० ॥
गिरनेसे पहले गिरनेसे-। बचानेका उपाय न होनेसे।
. गिरना ही पड़ता है वैसे। किसी मनुष्यको ॥ ७१ ॥
ज्ञानेश्वरी २२८

वैसे मृत्युके अवसरपर । बढता जो जीव सम्मुख आकर ।
उसमें ही चित्तका उलझकर । तद्रूप होना पड़ता ॥ ७२ ॥
जागृतिमें जिसकी लगन । करता मन उसका ध्यान ।
देखता वही निद्रामें स्वप्न । पांडुकुमार ॥ ७३ ॥
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मा मेवैष्यस्यसंशयम् ॥ ७ ॥
वैसे ही जीवनमें सतत । जीव रहता चावसे नित ।
जिसमें आसक्त वही बात । आती मृत्यु समय ॥ ७४ ॥
मरणमें जिसका जो स्मरण । उसकी होती वही गति जान ।
इसलिये कर सदा स्मरण । मेरा ही तू ॥ ७५ ॥
आंखोंसे जो देखना । कानोंसे जो सुनना ।
मनमें जो भावना । बोलना वाणीसे ॥ ७६ ॥
संपूर्ण हो अंदर बाहर । मद्रूप ये सभी व्यवहार ।
फिर सहज ही निरंतर । मै ही हूं ॥ ७७ ॥
अजी ! हुआ इस भांति ही जब । न मरता देह गिरा थी तब ।
संग्राम करने पर भी अब । भय रहा कहां ॥ ७८ ॥
मन बुद्धि तू संपूर्ण । मुझमें कर अर्पण ।
मद्रूप होगा तत्क्षण । प्रण है मेरा ॥ ७९ ॥
लीन हो जिसमें जीव अंतमें देह त्यागता ।
पाता है जो वही भाव जिसमें नित्य ही रत ॥ ६
तभी अखंड ही मेरा स्मरण कर जूझ तू ।
मन-बुद्धि मुझे देके पायेगा मुझ निश्चित ॥ ७ ॥
२२९ सातत्ययोग

इसलिये मेरे स्मरणका अभ्यास कर-
यह स्थिति होगी कैसे। यदि है संदेह वैसे।
देख साधना कर ऐसे। तब दे दोष ॥८०॥
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥८॥
अजी ! अभ्यास-योग बलसे। चितको जोड़ तू भलाईसे।
लूला भी है उपाय बलसे। चढ़ता पहाड़ ॥८१॥
वैसे अभ्याससे निरंतर। परम-पुरुषकी मुहर।
लगा चित पर फिर शरीर। रहे या ना रहे ॥८२॥
नाना वृत्तियोंमें जो डूबता। वह जब आत्मको वरता।
तब तन रहता या न रहता। स्मरता कौन ॥८३॥
सरिता-प्रवाहके जो साथ। सागरसे मिलता सतत।
वह जल देखता क्या बात। पीछे होता है क्या ? ॥८४॥
जैसे वह समुद्र बन जाता। वैसे चित्तका चैतन्य हो जाता।
वहां जन्म-मरण ही मिटता। जो है घनानंद ॥८५॥
कविं पुराणमनुशासितारम्
अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-
मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥९०॥
ब्रह्मका और योगका स्वरूप
अस्तित्व जिसका आकार रहित। जन्म-मृत्यु बिन रहता सतत।
वह है पूर्णत्वसे पूर्ण भरित। देखता पूर्ण ॥८६॥
जुटे अभ्यासमें चित्त न करें अन्य चिंतन ।
योगी निश्चित पाता है महा-पुरुष दिव्यको ॥
सर्वज्ञ कर्ता कवि जो पुराण
है सूक्ष्मसे सूक्ष्म अचिंत्य रूप ।
आदित्य दीप्ती तमसे परे जो
जगन्नियंता स्मरता सदा ही ॥ ९ ॥
ज्ञानेश्वरी २३०

गगनसे जो प्राचीन । परमाणुसे महीन ।
जिसका है सन्निधान । चलाता विश्व ॥ ८७ ॥
प्रसवता है जो सब । जीते हैं उससे सब ।
उटता तर्क भी सब । वह है अचिंत्य ॥ ८८ ॥
आगमें दीमक नहीं लगती । तेजमें जैसे रात नहीं आती ।
किंतु स्थूल-दृष्टि नहीं देखती । स्वरूप-तेज ॥ ८९ ॥
जो है सूर्यकणोंका निधान । ज्ञानियोंका नित्योदय जान ।
नहीं है जिसको अस्तमान । नाम-मात्र ॥ ९० ॥
प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥
प्राप्त होते ही मरण-काल । स्थिर-चित्तसे है जो तत्काल ।
स्मरता परब्रह्म सकल । अव्यंग जान ॥ ९१ ॥
पद्मासनमें रख शरीर । उत्तराभिमुख बैठकर ।
हृदयमें सुख रखकर । सत्कर्मका ॥ ९२ ॥
अन्त: मिलनके मनो-धर्मसे । स्वरूप-प्राप्तिके अनुरागसे ।
आत्म मिलनके समारोहसे । मिलनेके लिये ॥ ९३ ॥
जो आकलन योगसे । सुषुम्ना-मध्यमार्गसे ।
निकले अग्नि-स्थानसे । ब्रह्मरंध्र ॥ ९४ ॥
वहां प्राण तथा चित्तका । भास होता है संबंधका ।
जहां है प्राण संचारछा । मूर्ध्याकाश ॥ ९५ ॥
मन-स्थिरतासे धरा हुआ । भक्ति-भावनासे भरा हुआ ।
योग-बलसे जो सधा हुआ । सज्ज होकर ॥ ९६ ॥
प्रयाण-काले स्थिर-चित्त होके
सद्‌भक्तिसे निश्चल योग-युक्त ।
भ्रू-मध्यमें प्राण जो है टिकाता
वह योगि पाता सु दिव्य-धाम ॥ १० ॥
२३१ सातत्ययोग

जड़ाजड़को घुलाता । भ्रूमध्यमें लय होता ।
घंटानाद लय होता। घंटा में ही वैसे ॥ ९७ ॥
अथवा ज्योति घटमें ढकी । न जाने क्या हुई है कबकी ।
ऐसी मृत्यू आती है उसकी । पांडुकुमार ॥ ९८ ॥
ऐसा होता है वह पर-ब्रह्म । परम-पुरुष जिसका नाम ।
ऐसा है वह मेरा निजधाम । स्वयं है वह होता ॥ ९९ ॥
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥
वेदोंको भी अगम्य ब्रह्म-पद प्राप्त करनेका साधना मार्ग-
सकल-ज्ञानका अंत है जो ज्ञान । उस ज्ञानकी एक-मात्र खान
अक्षर कहते उसे ज्ञानी-जन । धनुर्धर ॥ १०० ॥
आंधीमें न उड़ता जान । होता जैसे स्वयं-गगन ।
यदि हो वह जैसा घन । टिकता कैसे ॥ १ ॥
ज्ञानका विषय होनेसे । गुना गया जो ज्ञानसे ।
वृत्ति-ज्ञान लय होनेसे । कहा अक्षर सहज ॥ २ ॥
तभी वेद-विद् नर । कहते उसे अक्षर ।
प्रकृतिसे जो है पर । परमात्म-रूप ॥ ३ ॥
विषयोंको विष मानकर । इंद्रिय सबको शुद्ध कर ।
देह-वृक्ष सायाके अंदर । बैठे है शांत ॥ ४ ॥
इस भांतिसे जो विरक्त । देखते निरंतर पथ ।
निष्कामसे हैं अभिप्रेत । सर्वदा जो ॥ ५ ॥
गाते जिसे अक्षर वेद-वेत्ता
विरक्त जाके जिसमें समाते ।
जो ब्रह्मचारी पद चाहते हैं
तुझे कहूंगा वह तत्व-सार ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी २३२

उसके प्रेमसे साधक जन। साधते हैं ब्रह्मचर्य कठिन।
इंद्रियोंपर करके शासन। कठोर नित्य ॥ ६ ॥
ऐसा जो महत्पद। दुर्लभ औ' अगाध।
तट पर ही वेद। खडे अगम्य हो ॥ ७॥
ऐसा जिसका लय होता। वह स्वयं वह बनता।
कैसा यह तुझे कहता। मैं फिर एक बार ॥ ८ ॥
अर्जुन कहता नारायण। यही पूछता था मेरा मन।
सहज कृपा की सकरुण। कहिये जी ॥ ९॥
किंतु कहना अति ही सरल। बोले त्रिभुवन-दीप ये बोल।
जानते हैं तेरा मन निर्मल। कहूंगा संक्षेपमें ॥ १० ॥
मनकी लत होती बहिर्मुख। उसको तोड़कर स्वाभाविक।
करना है उसको अंतर्मुख। हृदय-तलमें ॥ ११ ॥
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायाऽत्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥१२॥
बहिर्मुख मनको अंतर्मुख करनेकी साधना—
किंतु तभी है यह घड़ता। जब संयमकी कड़ी लगाता।
सर्व-द्वारमें अनवरत। निग्रहसे ॥ १२ ॥
स्वभावसे ही संयत मन। घर करता अन्तःकरण।
टूटे जिसके कर-चरण। घर न छोड़ता वैसे ॥ १३ ॥
जब होता चित्त ऐसा स्थिर। तब कर प्राणका ओंकार।
लाओ उसको मूर्ध्याकाशपर। सुषुम्ना मार्गसे ॥ १४॥
लय होता न होता आकाशमें। ऐसा धरना है उसे धारणामें।
होता है मात्रात्रय अर्ध-बिंदुमें। तब विलीन ॥ १५॥
तब तो वह समीर। गगनमें कर स्थिर।
ऐक्यमें जैसे ओंकार। लय कर बिंदुमें ॥ १६ ॥
रोकके इंद्रिय-द्वार जकड़े मन अंतर।
तालूमें रखके प्राण करते योग-धारणा ॥ १२ ॥
(30) २३३ सातत्ययोग

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥
तब मिटता है ओं स्मरण । लय होता गगनमें प्राण ।
प्रणव अन्तमें पूर्ण घन । रहता तब ॥ १७ ॥
तभी प्रणवैक नाम । यह एकाक्षर ब्रह्म ।
वह मद्रूप परम । जपते हुए ॥ १८ ॥
जो छोड़ देता है तन । त्रिशुद्धि मुझमें लीन ।
नहीं उसे मेरे बिन । गति अन्य ॥ १९ ॥
मृत्यु समय असहाय स्थितिमें भगवत्स्मरण होगा क्या ?—
अंतकालका स्मरण । करना सच अर्जुन ।
यह विचारता मन । कैसा होगा ॥ १२० ॥
इंद्रियां शिथिल होकर । जीवन-सुख डूब कर ।
मृत्यु-चिन्ह अंतर्बाहर । दीखने लगे ॥ २१ ॥
तब बैठ कर भला कौन । करेगा निरोध औ' धारण ।
कैसा करेगा अंतःकरण । स्मरण प्राणका ॥ २२ ॥
यदि ऐसा हो तेरा मन । संदेहात्मका तो अर्जुन ।
नित्य सेव्य मैं सेवालीन । होता हूं अंतमें ॥ २३ ॥
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ १५ ॥
करें उंच ब्रह्म उच्चार मनमें स्मरते मुझे ।
ऐसे जो तनको त्यागे पाता है गति उत्तम ॥ १३ ॥
अनन्य चित्त जो नित्य सदैव सरता मुझे ।
लीन जो मुझमें योगी पाता है सुखसे मुझे ॥ १४ ॥
मुझमें मिलके पाये महात्मा मोक्ष-सिद्धि जो ।
दुःखका घर जो जन्म न पाते हैं अशाश्वत ॥ १५ ॥
ज्ञानेश्वरी २३४

जीवन भर जो मेरी सेवा करता है अंतकालमें मैं उसकी सेवामें आता हूँ—
विषयोंको तिलांजलि देकर । प्रवृत्तिका जो निरोधकर ।
हृदयमें मद्रूप निरंतर । अनुभवते हैं । ॥ २४ ॥
उस अनुभवका जो भोग । कराता क्षुधा-तृषाका त्याग ।
वहां चक्षु आदिकी मांग । रहती कहां ॥ २५ ॥
ऐसे एकात्म हुए निरंतर । हृदयमें मुझसे मिलकर ।
समाते जो समरस हो कर । उपासनामें ॥ २६ ॥
होता जब उनका देहावसान । उनको करना है मेरा स्मरण ।
तब होता यदि मेरा आगमन । तो भक्तिका मूल्य ही क्या ? ॥ २७ ॥
अंतकालमें कोई दीन । पुकार करता रूदन ।
तब क्या उसके कारण । दौड़ना पड़ता मुझे ॥ २८ ॥
भक्तोंकी भी यदि यही स्थिति । तब गावें क्यों भक्तिकी महति ।
न करे संदेह-ग्रस्त मति । ऐसी तू अर्जुन ॥ २९ ॥
जिस समय वह स्मरता । उस समय मैं पहुंचता ।
यह बोझ भी नहीं सहता । मन मेरा ॥ १३० ॥
मान यह अपना ऋण । भक्तोंके प्रति प्रतिक्षण ।
सेवा करना है लक्षण । अंतमें मेरा ॥ ३१ ॥
संभवता व्याकुलताका भाव । अनुभवेगा सुकुमार देह ।
मान मैं देता हूं उनको गेह । आत्म-बोधका ॥ ३२ ॥
फिर देता मेरे स्मरणकी । छाया घनी सुशीलताकी ।
तथा-दृढ बुध्दि नित्यताकी । उसको मैं ॥ ३३ ॥
अंतकालमें व्याकुल । न होते भक्त सकल ।
आते अति सकुशल । मम धाममें ॥ ३४ ॥
उतारकर देहकी केंचुली । झाडकर अहंकारकी धूली ।
भिझकर सद्वासना मैं भली । अपनमें समरस करता ॥ ३५ ॥
भक्तोंको भी देह-भाव नहीं । देहमें रहते हुए कहीं ।
इसलिए देह त्यागमें ही । नहीं वियोग ॥ ३६ ॥
२३५ सातत्ययोग