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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 294

सभी साकार वस्तुओंमें ओतप्रोत अविनाशी-सत्त्व है ब्रह्म --
कहता है तब सर्वेश्वर । टूटे हुए हैं सब आकार ।
उसमें भी जो ठूंसने पर । टूटता नहीं ॥ १५ ॥
देखने पर बैसी उसकी सूक्ष्मता । शून्य किंतु शून्य नहीं है स्वभावता ।
गगनसे वह है छननेमें आता । जो है सूक्ष्मतम ॥१६॥
इस भांती यह विरल होकर । विज्ञान-पटमें भर हिलने पर ।
चूता नहीं जो वह पांडुकुमार । परब्रह्म है जान ॥ १७ ॥
सहज नित्यत्व है आध्यात्म
तथा जो आकारके साथ । न जानता जन्मकी बात ।
आकार-लोपमें समस्त । न जानता नाश ॥ १८ ॥
जो है अपना ही सहजत्व । जिसको है ब्रह्मका नित्यत्व ।
यही है जो सहज-नित्यत्व । कहलाता अध्यात्म ॥ १९ ॥
बिना कर्ताके अव्यक्तमें दीखनेवाली हलचल कर्म है---
जैसे गगनमें निर्मल । न जाने कैसे किसी काल ।
उमड फैलते बादल । नाना रंगके ॥ २० ॥
उस विशुद्ध अमूर्तमें जैसे । महत्तत्त्वादि जो भूत भेदसे ।
ब्रह्मांडके विभिन्न अंकुरसे । फूटने लगते ॥ २१ ॥
निर्विकल्पके उस ऊसर पर । फूटता आदि संकल्पका अंकुर ।
फिर बनते जाते घने आकार । ब्रह्म-गोलके ॥ २२ ॥
देखनेसे एकेकके भीतर । भरा है बीजसे ही भरपूर ।
होने-जाने वाले जीवोंकी अपार । गणना ही नहीं ॥ २३ ॥
फिर उन ब्रह्मगोलकोंके जो अंशांश । जानते आदि संकल्प असम साहस ।
जिससे बढ़ती ही जाती है अनायास । सृष्टि सर्वत्र ॥ २४ ॥
पर एक ही है दूसरेके बिन । पर-ब्रह्म ही भर रहा संपूर्ण ।
यहां अनेकत्वका आया महान । पूर जैसा ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी २२४