ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥
किंतु ऐसा न करके प्राणिजात । व्यर्थ ही खोता है जो अपना हित ।
मानो तैरते हैं जलमें सतत । हथेलीके ही ॥ ५१ ॥
या अमृतकुंडमें डूबकर । होठोंको दृढतासे दबाकर ।
स्मरण करता है निरंतर । डबरेका पानी ॥ ५२ ॥
किसलिये यह ऐसा करना । अमृतमें डूबकर मरना ।
सुखसे अमर क्यों नहीं होना । अमृतमें ही ॥ ५३ ॥
फलशाका पिंजडा तजकर । अनुभव पंखसे धनुर्धर ।
क्यों न करें चिदंबर संचार । समर्थ भावसे ॥ ५४ ॥
चिदाकाशमें ऊंचाई पर । करें सुखसे उन्मुक्त संचार ।
उसका है अनंत विस्तार । अपनाही ॥ ५५ ॥
असीम पर क्यों सीमाका नियमन । मुक्त निराकारको आकार बंधन ।
स्वयंसिद्धका करना क्यों बलिदान । साधन पर ॥ ५६ ॥
किंतु मेरा यह कथन । विचारान्तमें भी अर्जुन ।
न करेगा जीवोंका मन । इसका स्वीकार ॥ ५७ ॥
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नामिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५ ॥
मैं सर्वव्यापी हूं किंतु --
क्यों कि योगमायाके परदेसे । अंधत्व आनेके कारणसे ।
न देखता प्रकाश बलसे । मुझको कभी ॥ ५८ ॥
पूजते व्यक्त हो रूप बुद्धि-हीन न जानके ।
अव्यक्त श्रेष्ठ जो रूप मेरा अंतिम शाश्वत ॥ २४ ॥
घिरा मैं योग मायासे न हूं प्रकट विश्वसे ।
अजन्मा नित्य मैं ऐसा न जाने मूढ लोग जो ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी २१६