सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 293

तथा कैसे किया नियतांतःकरण । प्रयाण-कालमें कैसे हो तव ज्ञान ।
वह कैसे कहो तुम मुझे श्रीकृष्ण । पूर्ण-रूपसे ॥ ५ ॥
ज्ञान देनेमें उदार प्रसन्न प्रभु—
कोई सोया घरमें चिंतामणिके । यदि योगसे ही अपने भाग्यके ।
बोल भी उसके बड़बड़ानेके । न जाते व्यर्थ ॥ ६ ॥
अर्जुनके शब्दके साथ । मनमें कहते हैं नाथ ।
“तूने पूछा यही उचित ।” सुन तू अब ॥ ७ ॥
शावक है अर्जुन कामधेनुका । आसरा है ऊपर कल्पतरुका ।
होना उसके मनोरथ सिद्धिका । आश्चर्य क्या ॥ ८ ॥
क्रोधसे देता प्रभु जिसको मार । उसको होता है ब्रह्म साक्षात्कार ।
जिसको देता वह सीख कृपाकर । उसको क्या न मिलेगा ॥ ९ ॥
जब होते हम श्रीकृष्ण-शरण । कृष्ण होता अपना अंतःकरण ।
तब अपना संकल्पका अंगन । भरता महा-सिद्धिसे ॥ १० ॥
किंतु ऐसा जो प्रेम । पार्थमें है निःसीम ।
तभी उसका काम । सदा फलता ॥ ११ ॥
इस कारण ही वह अनंत । जानकर उसका मनेरथ ।
भर रखता थाली पकवानयुत । ज्ञानान्नसे आप ॥ १२ ॥
आपत्य जब स्नेहसे दूर होता । भूख उसकी अनुभवती माता ।
नहीं तो क्या वह शब्दसे कहता । मुझे दूध दे री ॥ १३ ॥
कृपालू गुरुदेवके यहां । आश्चर्य नहीं इसका जहां ।
जाने दो यह प्रभुने वहां । कहा क्या सुनो ॥ १४ ॥
भगवान उवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ ३ ॥
श्री भगवानने कहा
ब्रह्म अक्षर है श्रेष्ठ अध्यात्म निज-भाव जो ।
भूत-सृष्टि सजाता जो वह व्यापार कर्म है ॥ ३ ॥
२२३ सातत्ययोग