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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 288

धृतिका जो प्रतिकूल रहता । आशा-रससे परिपुष्ट होता ।
नियमका अनादर करता । द्वंद्व-मोह ॥ ६८ ॥
असंतुष्टताकी मदिरा । मत्त होकर धनुर्धर ।
विकार स्त्री-सह संसार । करता विषयोंमें ॥ ६९ ॥
जिससे भाव-शुद्धिकी राह पर । फैलाये विकल्पके कांटे अपार ।
खुल जाते सब कुपथ दो चार । अप्रवृत्तिके ॥ ७० ॥
इसने प्राणि गड़बड़ाये । संसार खडियामें फंसाये ।
फिर डंडुकेसे पिटवाये । महा-दुःखके ॥ ७१ ॥
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८ ॥
भाव-शुद्धिकी राह पर । विकल्प-शूल देखकर ।
नहीं आते जो लौट कर । बुद्धि-भ्रमसे ॥ ७२ ॥
थोडेसे जो मद्रूप होते हैं उनको अंतकालमें दुःख नहीं होता--
पगसे ही एक-निष्ठाके । शूलांकुरोंको विकल्पके ।
रौंध छोडे महा-पापके । वन-प्रांत ॥ ७३ ॥
सत्कर्मकी फिर दौड़-लगायी । मेरे सामिप्यकी मंजिल पायी ।
महा-विपत्तिसे जान बचायी । बटमारोंके ॥ ७४ ॥
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९ ॥
सहज ही सोचने पर पार्थ । जन्म मरणकी मिटती कथा ।
इस भांतिके प्रयत्नोंमें आस्था । उत्पन्न होती ॥ ७५ ॥
गँवाये जिसने पाप अपने पुण्य कर्मसे ।
दृढतासे भजते वे द्वंद्व मोह हटाकर ॥ २८ ॥
जुटे मेरे सहारे जो जीतते जन्म मृत्युको ।
जानते ब्रह्म वे पूर्ण तथा अध्यात्म-कर्म भी ॥ २९ ॥
ज्ञानेश्वरी ३१८