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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 289

उनका वह यत्न ही एक काल । देता समय पर-ब्रह्मका फल ।
पक्वतामें चूता रस पल पल । तब पूर्णताका ॥ ७६ ॥
कृतार्थतासे विश्व जब भरता । मिटती है अध्यात्मकी अपूर्णता ।
तथा कर्मका काम नहीं रहता । होता मन विलय ॥ ७७ ॥
उसकी ऐसा अध्यात्म लाभ । होता है सुन पुरुषर्षभ ।
उसका पूंजी हूं मैं सुलभ । इस उद्यममें ॥ ७८ ॥
साम्यके वृद्धिसे उसके । संधते व्यापार उसके ।
वहां दारिद्र्य जो द्वैतके । रहता नहीं ॥ ७९ ॥
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३० ॥
सब अधिभूत मुझको । प्रतीतिसे अधिदैवको ।
जिन्होंने जाना यथार्थको । धनंजय ॥ १८० ॥
अनुभवके ज्ञान बलसे । जानता मैं अधियज्ञ इसे ।
वह शरीरके वियोगसे । अकुलाता नहीं ॥ ८१ ॥
अन्यथा आयुष्य सूत्र जब टूटता । प्राणियोंका तब हृदय तड़पता ।
सजीवके चितमें भी युगांत आता । देखकर यह ॥ ८२ ॥
किंतु यह नहीं जाने कैसा । ज्ञानियोंका नहीं होता ऐसा ।
अंतकालमें भी वह सहसा । मुझे भूलते नहीं ॥ ८३ ॥
अन्यथा तू यह जान । ऐसे जो महा-निपुण ।
औ' युक्त अंतःकरण । योगी हैं वही ॥ ८४ ॥
सातवे अध्यायका ज्ञानेश्वर कृत उपसंहार और आठवेकी भूमिका—
तब यह शब्द कूपका तल । न पहुंचा पार्थ कर-कमल ।
पल एक पार्थ था उस काल । पिछडा हुआ ॥ ८५ ॥
अधिभूताधि दैवोंमें मुझे जो अधि-यज्ञमें ।
प्रयाण-कालमें भी जो जानते रह सावध ॥ ३० ॥
२१९ ज्ञान-विज्ञानयोग