ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 298, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंमेरे स्मरण-पूर्वक जो शरीर छोड़ता है वह मद्रूप होता है—
अधियज्ञ कहते हैं जिसे। अभी कहा था तुझसे ऐसे।
जीवनमें जो जानते उसे। औ' मरते समय भी ॥ ५९ ॥
शरीर एक झोल मानकर। अपनेमें ही आप होकर।
मठ जैसे व्योमसे भर कर। रहता उसीमें ॥ ६० ॥
इस प्रतीतिके अंगनमें। निश्चलताके अंतःकक्षमें।
सोते हैं सो विषयोंको उनमें। नहीं प्रवेश ॥ ६१ ॥
अंतर्वाह्य ऐसा ऐक्य भरा है। जो आप मद्रूप बन गया है।
पंच-भूतोंका झोल उतरा है। अनजाने बाहर ही ॥ ६२ ॥
जीवनमें उभयत्व नहीं जिसके। मरणमें संकर कैसे जी उनके।
तभी न हिले अनुभूति उदरके। निश्चय रूप जो ॥ ६३ ॥
वह है ऐक्य रससे ढली हुई। या नित्यता हृदयमें बसी हुई।
या समरस-सिंधुसे धुली हुई। न होती जो मलिन ॥ ६४ ॥
मटका अथाह पानीमें डूब कर। जलसे भरकर अंदर बाहर।
दैव गतिसे मानो टूटा वहीं पर। तब होगा क्या रीता ? ॥ ६५ ॥
या सांपने केंचुला उतारा। या किसीने कपडा उतारा।
इससे टूटा क्या अंग सारा। या अवयव ॥ ६६ ॥
वैसा है भासमान शरीराकार। गिरता तब आत्मवस्तु अंतर।
भरा है बोधसे जहां भरपूर। अपनेमें आप ॥ ६७ ॥
मुझे इस प्रकार। अंतमें जानकर।
छोड़ते हैं शरीर। होते हैं मद्रूप ॥ ६८ ॥
इसलिये तू मेरे स्मरण पूर्वक युद्ध-रत हो जा—
अथवा वैसे भी साधारण। जिसे स्मरता अंतःकरण।
प्राप्त करता है जो मरण। तद्रूप होता ॥ ६९ ॥
कोई एक अकुलाहटसे। भागते हुए वायु-वेगसे।
सहसा फिसलकर जैसे। गिरा कुएमैं ॥ ७० ॥
गिरनेसे पहले गिरनेसे-। बचानेका उपाय न होनेसे।
. गिरना ही पड़ता है वैसे। किसी मनुष्यको ॥ ७१ ॥
ज्ञानेश्वरी २२८