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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 299

वैसे मृत्युके अवसरपर । बढता जो जीव सम्मुख आकर ।
उसमें ही चित्तका उलझकर । तद्रूप होना पड़ता ॥ ७२ ॥
जागृतिमें जिसकी लगन । करता मन उसका ध्यान ।
देखता वही निद्रामें स्वप्न । पांडुकुमार ॥ ७३ ॥
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मा मेवैष्यस्यसंशयम् ॥ ७ ॥
वैसे ही जीवनमें सतत । जीव रहता चावसे नित ।
जिसमें आसक्त वही बात । आती मृत्यु समय ॥ ७४ ॥
मरणमें जिसका जो स्मरण । उसकी होती वही गति जान ।
इसलिये कर सदा स्मरण । मेरा ही तू ॥ ७५ ॥
आंखोंसे जो देखना । कानोंसे जो सुनना ।
मनमें जो भावना । बोलना वाणीसे ॥ ७६ ॥
संपूर्ण हो अंदर बाहर । मद्रूप ये सभी व्यवहार ।
फिर सहज ही निरंतर । मै ही हूं ॥ ७७ ॥
अजी ! हुआ इस भांति ही जब । न मरता देह गिरा थी तब ।
संग्राम करने पर भी अब । भय रहा कहां ॥ ७८ ॥
मन बुद्धि तू संपूर्ण । मुझमें कर अर्पण ।
मद्रूप होगा तत्क्षण । प्रण है मेरा ॥ ७९ ॥
लीन हो जिसमें जीव अंतमें देह त्यागता ।
पाता है जो वही भाव जिसमें नित्य ही रत ॥ ६
तभी अखंड ही मेरा स्मरण कर जूझ तू ।
मन-बुद्धि मुझे देके पायेगा मुझ निश्चित ॥ ७ ॥
२२९ सातत्ययोग