ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 290, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंजहां तद्ब्रह्मवाक्फल । जो ज्ञानार्थसे रसाल ।
साभिप्राय परिमल । भावोंके हैं ॥ ८६ ॥
जो सहज कृपामंदानिल । कृष्णाद्रुमका वचन-फल ।
लाया अर्जुन श्रवण-तल । अकस्मात ॥ ८७ ॥
जो ये तत्व सिद्धांतसे बनाये । ब्रह्म-रस सागरमें हैं डुबोये ।
फिर वैसे ही ये जो पगाये । परमानंदमें ॥ ८८ ॥
उसके निर्मल सौंदर्यसे । ज्ञान-उन्मेशकी वासनासे ।
चूने लगा पार्थकी जिव्हासे । विस्मयामृत ॥ ८९ ॥
लाभसे उस सुख-संपत्तिके । सुरसुराहटसे हृदयके ।
व्यंग दिखाकर स्वर्ग-सुखके । हंसने लगा ॥ २९० ॥
फलका बाह्य सलोनापन । अनुभव करके अर्जुन ।
रस-स्वादमें रसना मन । खो बैठा सहज ॥ ९१ ॥
उठाकर वह वाक्फल । अनुमानका करतल ।
प्रतीति-मुखमें तत्काल । भरने लगा ॥ ९२ ॥
किंतु विचार मुखमें न समाता । हेतुका दांत नहीं काट सकता ।
इसलिये पार्थ मुख न लगाता । उस फलको ॥ ९३ ॥
कहता तब अर्जुन हो चमत्कृत । तारागण ये जलमें प्रति-बिंबित ।
ऐसे हैं तेरे ये वाक्फल सुशोभित । इसमें मैं उलझा ॥ ९४ ॥
नहीं ये तेरे साधारण शब्द । है अनुभव-गगन विषद ।
थाह न पाती बुद्धि भाव-पद । डूब जाती है ॥ ९५ ॥
मनमें जान यह गोष्ट । कृपार्थ पुनः किरीटी ।
पुनरपि घुमाता दृष्टि । कृष्ण चरणमें ॥ ९६ ॥
विनय करता अर्जुन । ये सात ही पद नवीन ।
ग्रहण न करते कान । आश्चर्यकारक ॥ ९७ ॥
श्रवण करके ही ये केवल । इनके प्रमेयोंका जो है जाल ।
करेगा मन इन्हें करतल । ऐसे लगा था ॥ ९८ ॥
ऐसा नहीं यह निश्चय । देख अक्षर समुदाय ।
है साश्चर्य-जीव आश्चर्य । देव मेरा ॥ ९९ ॥
ज्ञानेश्वरी २२०