ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 297, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंवैराग्य और अभ्याससे अविद्या-मल दूर करो—अधियज्ञ
वैराग्य ईंधनसे भरपूर । इंद्रियानल प्रज्वलित कर ।
विषय-द्रव्य आहुति देकर । उसमें तब ॥ ४८ ॥
वज्रासन धरातल बनाकर । आधार-मुद्रा-वेदिका रचकर ।
शरीर-मंडपका शोधन कर । अनंतर पार्थ ॥ ४९ ॥
कुंडमें संयमाग्निके । मंत्र-घोषसे युक्तिके ।
देना इंद्रिय-द्रव्यके । शाकल्य नित्य ॥ ५० ॥
फिर मन-प्राण तथा संयम । है हवन संप्रदाय संभ्रम ।
इससे तुष्ट करना निर्धूम । ज्ञानानल ॥ ५१ ॥
ऐसा यह सकल-साधन । ज्ञानाग्निमें करनेसे अर्पण ।
ज्ञेयमें लय होकर ज्ञान । ज्ञेय ही रहता ॥ ५२ ॥
इसका नाम अधियज्ञ । ऐसा बोला है जब सर्वज्ञ ।
तब पार्थने जो अति प्राज्ञ । जान लिया पूर्ण ॥ ५३ ॥
अंतकालकी स्थितिका वर्णन—
जानकर यह बोले कृष्ण । कर रहा है न तू श्रवण ।
देख कृष्णका मुदित मन । खिल उठा पार्थ ॥ ५४ ॥
सन्तानकी तृप्तिसे तृप्त होना । या शिष्यकी पक्वतासे खिलना ।
जानते मात्र सद्गुरु महान । या जन्मदात्री ॥ ५५ ॥
तब खिल उठे सात्त्विक-भाव । नारायणमें नरसे भी पूर्व ।
किंतु समता-बुद्धिसे ही देव । संयत आप ॥ ५६ ॥
पक्व-फलका है परिमल । या शीतल अमृत-कल्लोल ।
वैसे कोमल तथा सरल । बोले शब्द ॥ ५७ ॥
श्रोतृ-श्रेष्ठ तू अर्जुन । मेरी बात यह सुन ।
जलानेवाला जो ज्ञान । अलाता मायाको ॥ ५८ ॥
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्
यः प्रयाति सम्मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥५॥
प्रयाण कालमें भी जो मेरे ही ध्यानमें रत ।
जाते हैं तजके देह मिलता मुझ निश्चित ॥ ५ ॥
२२७ सातत्ययोग