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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 291

कानोंके इन गवाक्षोंसे । शब्द-किरण प्रवेशसे ।
मन हुआ चमत्कृतिसे । चकित मेरा ॥ २०० ॥
चाहता मैं भावको जानना । कहनमें समयको खोना ।
कष्ट कर प्रभु निरूपण । कर तू सत्वर ॥ १ ॥
पीछेका कर अवलोकन । अगले पर रख नयन ।
स्व-इच्छाका भी कर दर्शन । पूछना चतुराइसे ॥ २ ॥
देख अर्जुनका चतुरपन । न कर मर्यादाका उल्लंघन ।
करता हृदयका आलिंगन । श्रीकृष्णके ॥ ३ ॥
कैसे पूछना है प्रश्न । रखकर अवधान ।
जानता यह अर्जुन । भली भांति ॥ ४ ॥
अर्जुनका है ऐसा पूछना । श्रीकृष्णका भाव समझाना ।
संजयको भाये ये वचन । कहेगा वह प्रेमसे ॥ ५ ॥
सुनो उस संवादको दे ध्यान । करूंगा देश भाषामें कथन ।
कानसे आगे करके नयन । जानेंगे वह ॥ ६ ॥
बुद्धि-जिव्हासे चखनेसे पूर्व अक्षर । देखकर नयन उनका अलंकार ।
अनुभवेंगे इंद्रिय अपरंपार । सुख संतोषको ॥ ७ ॥
जैसे मालतीका फूल । घ्राणसे है परिमल ।
लेनेसे पूर्व कोमल । सुख लेते नयन ॥ ८ ॥
वैसे है देशीका जो सौंदर्य । करायेगा इंद्रियसे राज्य ।
फिर करेगा वह प्रमेय- । सुधा-पान ॥ ९ ॥
जहां होती है वाचा मौन । वह करूंगा मैं कथन ।
यह ज्ञानदेव-वचन । जो हैं निवृत्ति-दास ॥ २१० ॥
गीता श्लोक ३०
ज्ञानेश्वरी ओवी २१०.